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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

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३८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| नार्थम् । तथा च दर्शयिष्यति फलमशनायामृत्युभावम् । | संसारसम्बन्धित्व प्रदर्शित करनेके लिये किया गया है। इसी प्रकार श्रुति हिरण्यगर्भको क्षुधारूप मृत्युभावकी प्राप्ति दिखलावेगी। |
| न नित्यानां संसारविषयफलत्वमिति चेन्न, सर्वकर्मफलोपसंहारश्रुतेः। सर्वं हि पत्नीसम्बद्धं कर्म । “जाया मे स्यात्..... एतावान्वै कामः” (बृ०उ० १।४।१७) इति निसर्गत एव सर्वकर्मणां काम्यत्वं दर्शयित्वा, पुत्रकर्मापरविद्यानां च “मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोकः” (बृ०उ० १।५।१६) इति फलं दर्शयित्वा, त्र्यन्नात्मकतां चान्ते उपसंहरिष्यति “त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म” ( बृ० उ० १।६।१) इति। सर्वकर्मणां फलं व्याकृतं संसार एवेति । | यदि कहो कि नित्यकर्म संसारविषयक फलवाले नहीं हैं तो यह ठीक नहीं, क्योंकि समस्त कर्मफलोंका [ सांसारिक विषयोंमें ही ] उपसंहार किया जाता है—ऐसी श्रुति है। सारे ही कर्मोंका सम्बन्ध स्त्रीसे है। “मुझे स्त्री प्राप्त हो... इतनी ही कामना है” इस प्रकार स्वभावसे ही समस्तकर्मोंकी सकाम्यता दिखलाकर फिर पुत्र, कर्म और अपरा विद्याके “मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक” इस प्रकार विभिन्न फल दिखाते हुए श्रुति “यह जगत् नाम, रूप और कर्म—इन तीन अवयवोंसे युक्त है” ऐसा कहकर अन्तमें इसकी तीन अन्नरूपताका उपसंहार करेगी। तात्पर्य यह है कि समस्त कर्मोंका फल व्याकृत संसार ही है। |
| इदमेव त्रयं प्रागुत्पत्तेस्तर्ह्यव्याकृतमासीत्। तदेव पुनः सर्वप्राणिकर्मवशाद्व्याक्रियते बीजादिव वृक्षः। सोऽयं व्याकृता- | यही त्रय उत्पत्तिसे पूर्व तो अव्याकृत ही था। वही बीजसे वृक्षके समान समस्त प्राणियोंके कर्मवश व्याकृत हो जाता है। वह यह व्यक्ताव्यक्तरूप संसार अविद्याका |