बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
९२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
| ९२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| भवतीत्यर्थः; तमाक्रमं परलोकस्थानायोन्मुखीभूतं प्राप्ताङ्कुरीभावमिव बीजं तमाक्रममाक्रम्यावष्टभ्याश्रित्योभयान् पश्यति—बहुवचनं धर्माधर्मफलानेकत्वात्—उभयानुभयप्रकारानित्यर्थः। | युक्त होता है, उस आक्रमको--अङ्कुरभावको प्राप्त हुए बीजके समान परलोकस्थानके प्रति उन्मुख हुए उस आक्रमको आक्रान्त कर, उसका अवष्टम्भ अर्थात् आश्रय लेकर दोनों लोकोंको देखता है। 'उभयान्' इस पदमें बहुवचन धर्माधर्मके फलोंकी अनेकताके कारण है।^१ उभयान् अर्थात् उभय प्रकारके। |
| कांस्तान् ? पाप्मनः पापफलानि—न तु पुनः साक्षादेव पाप्मनां दर्शनं सम्भवति, तस्मात् पापफलानि दुःखानीत्यर्थः—आनन्दांश्च धर्मफलानि सुखानीत्येतत्, तानुभयान् पाप्मन आनन्दांश्च पश्यति जन्मान्तरदृष्टवासनामयान्; यानि च प्रतिपत्तव्यजन्मविषयाणि क्षुद्रधर्माधर्मफलानि, धर्माधर्मप्रयुक्तो देवतानुग्रहाद् वा पश्यति। | उनको किनको ? पापोंको अर्थात् पापके फलोंको। साक्षात् पापोंका ही दर्शन होना तो सम्भव है नहीं, इसलिये पापोंके फल अर्थात् दुःखोंको और आनन्दोंको अर्थात् धर्मके फलरूप सुखोंको-इन जन्मान्तरदृष्ट वासनाओंके कार्य पाप (दुःख) और आनन्द दोनोंहीको देखता है। इनके सिवा, जो प्राप्त होनेवाले जन्मोंसे सम्बद्ध धर्म और अधर्मके क्षुद्र फल हैं, उन्हें भी धर्माधर्मसे प्रेरित होकर अथवा देवताके अनुग्रहसे देखता है। |
| तत् कथमवगम्यते परलोकस्थानभावितपाप्मानन्ददर्शनं स्वप्ने ? | किंतु यह कैसे जाना जाता है कि स्वप्नमें परलोकस्थानमें होनेवाले सुखदुःखोंका दर्शन होता है; |
| इत्युच्यते—यस्मादिह जन्मन्यननुभाव्यमपि पश्यति बहु; न च स्वप्नो नामापूर्वं दर्शनम्; | सो बतलाया जाता है-क्योंकि जिनका इस जन्ममें अनुभव नहीं हो सकता, ऐसी भी बहुत-सी बातें देखता है; और स्वप्न अपूर्वदर्शन हो--ऐसी बात है नहीं, |
१. क्योंकि वे दोनों लोक हैं तो धर्माधर्मके परिणाम ही।