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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
७०८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३
Page 718Permalink
७०८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| मेव ह्यात्मनो नित्यत्वमुपपद्यते विक्रियाभावे; विक्रियावच्च नित्यमिति च विप्रतिषिद्धम् । “ध्यायतीव लेलायतीव” (४ । ३ । ७) “न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते” (४ । ३ । २३) “एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य” (४ । ४ । २३) इति च श्रुत्यक्षराण्यन्यथा न गच्छन्ति ।<br><br>ननु द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञातेत्येवमादीन्यप्यक्षराण्यात्मनोऽविक्रियत्वे न गच्छन्तीति; न; यथाप्राप्तलौकिकवाक्यानुवादित्वात्तेषाम् । न आत्मतत्त्वनिर्धारणार्थानि तानि; ‘न दृष्टेर्द्रष्टारम्’ इत्येवमादीनामन्यार्थासम्भवाद् यथोक्तार्थपरत्वमवगम्यते । तस्मादनवबोधादेव हि विशेषणं परित्यक्तं दृष्टेरिति । | उचित जान पड़ता है; क्योंकि विकारका अभाव होनेके कारण इसी प्रकार आत्माका नित्यत्व सम्भव हो सकता है । [ किन्तु यदि आत्माको दृष्टिकर्ता माना जायगा तो वह विकारी होगा ] और जो विकारी है, वह नित्य हो—ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है । इसके सिवा “ध्यायतीव लेलायतीव” “न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते” “एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य” इत्यादि श्रुतियोंके अक्षरोंकी भी अन्य किसी प्रकार गति नहीं है ।<br><br>यदि कहो कि आत्माको विकारहीन माननेपर तो द्रष्टा, श्रोता मन्ता, विज्ञाता इत्यादि शब्दोंकी भी कोई सङ्गति नहीं लग सकती, तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वे तो यथाप्राप्त लौकिक वाक्योंका अनुवाद करनेवाले हैं । वे आत्मतत्त्वका निर्णय करनेके लिये नहीं हैं; “न दृष्टेर्द्रष्टारम्” इत्यादि श्रुतियोंका कोई अन्य अर्थ होना सम्भव न होनेके कारण उनका उपर्युक्त अर्थमें ही तात्पर्य समझा जाता है । अतः अन्य व्याख्याताओंने अज्ञानसे ही ‘दृष्टेः’ इस विशेषणका त्याग किया है । |
१. यह ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) की नित्य महिमा है ।