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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

४५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

४५८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| स यथा लोक ऊर्णनाभिः । ऊर्णनाभिर्लूताकीट एक एव प्रसिद्धः सन्स्वात्माप्रविभक्तेन तन्तुनोच्चरेदुद्गच्छेत् । न चास्ति तस्योद्गमने स्वतोऽतिरिक्तं कारकान्तरम् । यथा चैकरूपादेकस्मादग्नेः क्षुद्रा अल्पा विस्फुलिङ्गाःस्फुलिङ्गाऽग्न्यवयवा व्युच्चरन्ति विविध नानावोच्चरन्ति । यथेमौ दृष्टान्तौ कारकभेदाभावेऽपि प्रवृत्तिं दर्शयतः, प्राक्प्रवृत्तेश्च स्वभावत एकत्वम्, एवमेवास्मादात्मनो विज्ञानमयस्य प्राक्प्रतिबोधाद्यत्स्वरूपं तस्मादित्यर्थः। सर्वे प्राणा वागादयः, सर्वे लोका भूरादयः, सर्वाणि कर्मफलानि, सर्वे देवाः प्राणलोकाधिष्ठातारोऽग्न्यादयः, सर्वाणि भूतानि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानि प्राणिजातानि, सर्व एत आत्मान इत्यस्मिन्पाठे उपाधिसम्पर्कजनितप्रबुध्यमानविशेषात्मान इत्यर्थः, व्युच्चरन्ति । | लोकमें जिस प्रकार वह ऊर्णनाभि—जो लूताकीट (जाल बनानेवाला कीड़ा) प्रसिद्ध है वह अकेला ही अपनेसे सर्वथा भेद न रखनेवाले तन्तुओंके द्वारा ऊपरकी ओर जाता है; उसके ऊपर जानेमें अपनेसे भिन्न कोई अन्य साधन नहीं है । तथा जिस प्रकार एकरूप अर्थात् एक ही अग्निसे क्षुद्र-अल्प विस्फुलिङ्ग-चिनगारियाँ यानी अग्निकण विविध—नानाउड़ते हैं। जिस प्रकार ये दोनों दृष्टान्त कारकभेद न होनेपर भी प्रवृत्ति प्रदर्शित करते हैं और प्रवृत्तिसे पूर्व स्वरूपतः एकत्व दिखलाते हैं, इसी प्रकार इस आत्मासे अर्थात् बोध होनेसे पूर्व इस विज्ञानमय आत्माका जो स्वरूप है, उससे वागादि समस्त प्राण, भूर्लोकादि समस्त लोक यानी सम्पूर्ण कर्मफल, प्राण और लोकोंके अधिष्ठाता अग्नि आदि समस्त देवगण और समस्त भूत अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणिसमुदाय [इस आत्मासे] विविधरूपसे उत्पन्न होते हैं। जहाँ 'सर्वे एते आत्मानः'¹ ऐसा पाठ है, वहाँ 'उपाधिसंसर्गके कारण जिनका विशेष रूप जाना जाता है, वे अनेक आत्मा (जीव) उत्पन्न होते हैं'—ऐसा अर्थ करना चाहिये । |


१. माध्यन्दिन-शाखाकी श्रुतिमें ऐसा पाठ है।