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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

११७८ || बृहदारण्यकोपनिषद् || [अध्याय ५

११७८ || बृहदारण्यकोपनिषद् || [अध्याय ५


संस्कृतहिन्दी व्याख्या
रालम्बनमशक्यं ग्रहीतुमिति श्रद्धाभक्तिभ्यां भावविशेषेण चोङ्कार आवेशयति । यथा विष्ण्वङ्गाङ्कितायां शिलादिप्रतिमायां विष्णुं लोक एवम् ।होनेके कारण निरालम्बन है और ग्रहण नहीं किया जा सकता, इसलिये श्रुति श्रद्धाभक्तिपूर्वक भाव-विशेषके द्वारा उसका ओङ्कारमें आवेश करती है। जिस प्रकार लोक विष्णुके अङ्गोंसे अङ्कित शिलादिकी प्रतिमामें विष्णुका आवेश करता है, उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये।
वायुरं खं वायुरस्मिन् विद्यत इति वायुरं खं खमात्रं खमित्युच्यते न पुराणं खमित्येवमाह स्म । कोऽसौ ? कौरव्यायणीपुत्रः । वायुरे हि खे मुख्यः खशब्दव्यवहारः, तस्मान्मुख्ये सम्प्रत्ययो युक्त इति मन्यते ।'वायुरं खम्'—जिसमें वायु रहता है, ऐसा यह वायुर ख अर्थात् आकाशमात्र ही 'खम्' इस पदसे कहा जाता है, सनातन आकाश नहीं—ऐसा कहा है। वह कहने-वाला कौन है?—कौरव्यायणीपुत्र। ख शब्दका मुख्य व्यवहार वायुर आकाशमें ही है, अतः [गौण^१-मुख्य न्यायसे] इसका मुख्य अर्थमें ही प्रत्यय मानना उचित है—ऐसा वह मानता है।
तत्र यदि पुराणं खं ब्रह्म निरुपाधिकस्वरूपं यदि वा वायुरं खं सोपाधिकं ब्रह्म सर्वथाप्योङ्कारः, प्रतीकत्वेनैव प्रतिमावत् साधनत्वंसो यहाँ 'खम्' इस पदका अभिप्राय सनातन आकाशरूप निरुपाधिक ब्रह्मसे हो या वायुर आकाशरूप सोपाधिक ब्रह्मसे, सभी प्रकार प्रतिमाके समान प्रतीकरूपसे

१. 'गौणमुख्ययोर्मुख्ये कार्यसम्प्रत्ययः'—गौण और मुख्य—इनमेंसे मुख्यमें ही कार्यकी सम्यक् प्रतीति होती है—इस न्यायके अनुसार मुख्य अर्थमें प्रतीति ठीक ही है।