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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५३

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५३


फिर उस (याज्ञवल्क्य) से जारत्कारव आर्तभागने पूछा; वह बोला, 'याज्ञवल्क्य ! ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने हैं?' [ याज्ञवल्क्य- ] 'आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं।' [ आर्तभाग- ] 'वे जो आठ ग्रह और आठ अतिग्रह हैं, वे कौन-से हैं?' ॥ १ ॥

शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
**अथ हैनम्-**हशब्द ऐतिह्यार्थः ! अथानन्तरमश्वले उपरते प्रकृतं याज्ञवल्क्यं जरत्कारुगोत्रो जारत्कारवः-ऋतभागस्यापत्यमार्तभागः पप्रच्छ । याज्ञवल्क्येति होवाचेत्यभिमुखीकरणाय । पूर्ववत् प्रश्नः—कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति । इतिशब्दो वाक्यपरिसमाप्त्यर्थः ।'अथ हैनम्' इसमें 'ह' शब्द इतिहासको सूचित करनेके लिये है। अथ-अनन्तर यानी अश्वलके चुप हो जानेपर उस प्रकृत याज्ञवल्क्यसे जो जरत्कारुगोत्रवाला था उस जारत्कारव आर्तभाग—ऋतभागके पुत्रने पूछा। वह अपने अभिमुख करनेके लिये बोला—'हे याज्ञवल्क्य !'। 'कितने ग्रह हैं और कितने अतिग्रह हैं। यह प्रश्न पहलेहीके समान है। इसमें 'इति' शब्द वाक्यकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है।
तत्र निर्ज्ञातेषु वा ग्रहातिग्रहेषु प्रश्नः स्यादनिर्ज्ञातेषु वा ? यदि तावद्ग्रहा अतिग्रहाश्च निर्ज्ञाताः, तदा तद्गतस्यापि गुणस्य सङ्ख्याया निर्ज्ञातत्वात् कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति सङ्ख्याविषयः प्रश्नो नोपपद्यते । अथानिर्ज्ञातास्तदाकिंतु यह प्रश्न सम्यक् प्रकारसे जाने हुए ग्रह और अतिग्रहोंके विषयमें है अथवा न जाने हुओंके विषयमें ? यदि ग्रह और अतिग्रह सम्यक् प्रकारसे ज्ञात हों तो उनमें रहनेवाला गुण जो संख्या है, वह भी ज्ञात ही रहेगी; उस अवस्थामें 'ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने हैं, ऐसा संख्याविषयक प्रश्न उपपन्न नहीं होगा। और यदि उन्हें अज्ञात माना