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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५१

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५१

वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मैं आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ४ ॥

| यदेव ते कश्चिद् बर्कुशिति नामतो वृष्णस्यापत्यं वार्ष्णः; चक्षुर्वै ब्रह्मेति; आदित्यो देवता चक्षुषि। उपनिषत्—सत्यम्; यस्माच्छ्रोत्रेण श्रुतममृतमपि स्यात्, न तु चक्षुषा दृष्टम्; तस्माद् वै सम्राट् पश्यन्तमाहुः—अद्राक्षीस्त्वं हस्तिनमिति, स चेदद्राक्षमित्याह, तत् सत्यमेव भवति यस्त्वन्यो ब्रूयात्—अहमश्रौषमिति; तद् व्यभिचरति; यत्तु चक्षुषा दृष्टं तद्व्यभिचारित्वात् सत्यमेव भवति ॥ ४ ॥ | 'यदेव ते कश्चित्'—बर्कु इस नामवाले वार्ष्ण—वृष्णके पुत्रने 'चक्षु ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है; चक्षुमें आदित्य देवता है। उसकी 'सत्य' यह उपनिषद् है, क्योंकि कानसे सुना हुआ तो मिथ्या भी हो सकता है, किंतु नेत्रसे देखा हुआ नहीं हो सकता; हे सम्राट् ! इसीसे देखनेवालेसे कहते हैं 'तुमने हाथी देखा ?' इसपर यदि वह कहे कि देखा है तो वह सत्य ही होता है। यदि कोई अन्य कहे कि मैंने सुना है तो उसमें तो अन्तर आ सकता है। किंतु जो नेत्रसे देखा हुआ होता है, उसमें अन्तर न आनेके कारण वह सत्य ही होता है ॥ ४ ॥ |


गर्दभीविपीतके कहे हुए श्रोत्रब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन

यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे गर्दभीविपीतो भारद्वाजः श्रोत्रं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तद् भारद्वाजोऽब्रवीच्छ्रोत्रं वै ब्रह्मेत्यशृण्वतो किँ स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां

८५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४


न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य श्रोत्रमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा-नन्त इत्येनदुपासीत कानन्तता याज्ञवल्क्य दिश एव सम्राडिति होवाच तस्माद् वै सम्राडपि यां कां च दिशं गच्छति नैवास्या अन्तं गच्छत्यनन्ता हि दिशो दिशो वै सम्राट् श्रोत्र ँ श्रोत्रं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैन ँ श्रोत्रं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभ ँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः । स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥५॥

[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक-] 'मुझसे भारद्वाजगोत्रोत्पन्न गर्दभीविपीतने कहा है कि श्रोत्र ही ब्रह्म है।' [ याज्ञवल्क्य-] 'जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस भारद्वाजने 'श्रोत्र ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है; क्योंकि न सुननेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं?' [ जनक ] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! वह हमें आप बताइये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'श्रोत्र ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है तथा इसकी 'अनन्त' इस रूपसे उपासना करे।' [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! अन-न्तता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! दिशाएँ ही अनन्तता हैं' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'इसीसे हे सम्राट् ! कोई भी जिस किसी दिशाको जाता है, वह उसका अन्त नहीं पाता; क्योंकि दिशाएँ अनन्त हैं' और हे सम्राट् ! दिशाएँ ही श्रोत्र हैं। श्रोत्र ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, श्रोत्र उसका त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार देते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मैं आपको