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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

६०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

Page 610Permalink
६०२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
त्वस्य। तदिदममृतत्वं केवलयात्मविद्यया कर्मनिरपेक्षया प्राप्यते; यस्मात् कर्मप्रकरणे वक्तुं प्राप्तापि सती प्रवर्ग्यप्रकरणे, कर्मप्रकरणादुत्तीर्य कर्मणा विरुद्धत्वात् केवलसंन्याससहिता अभिहिता अमृतत्वसाधनाय। तस्मान्नातः परं पुरुषार्थसाधनमस्ति।अमृतत्व तो कर्मकी अपेक्षासे रहित केवल आत्मविद्याके द्वारा ही प्राप्त होता है; क्योंकि प्रवर्ग्यप्रकरणरूप कर्मके प्रकरणमें कहनेके लिये प्राप्त होनेपर भी कर्मसे विरुद्ध होनेके कारण उसे कर्मप्रकरणसे निकाल-कर अमृतत्वसाधनके लिये संन्यास-के साथ वर्णन किया है। अतः इससे बढ़कर कोई और पुरुषार्थका साधन नहीं है।
अपि चैवं स्तुता ब्रह्मविद्या—इसके सिवा ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की गयी है—
सर्वो हि लोको द्वन्द्वारामः “स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते’ (बृ० उ० १।४।३) इति श्रुतेः। याज्ञवल्क्यो लोकसाधारणोऽपि सन्नात्मज्ञानबलाद्भार्यापुत्रवित्तादिसंसाररतिं परित्यज्य प्रज्ञानतृप्त आत्मरतिर्बभूव।सारा ही लोक द्वन्द्वोंमें रमण करनेवाला है, जैसा कि “वह विराट् पुरुष [अकेला होनेके कारण] रममाण नहीं हुआ, इसीसे अकेला पुरुष रमण नहीं करता” इस श्रुति-से सिद्ध होता है। याज्ञवल्क्य साधारण लोकके समान होते हुए भी आत्मज्ञानके बलसे स्त्री, पुत्र एवं धन आदि संसारकी आसक्तिको छोड़कर ज्ञानतृप्त हो आत्मामें प्रेम करनेवाले हो गये थे।
अपि चैवं स्तुता ब्रह्मविद्या—इसके सिवा ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की गयी है—
यस्माद्याज्ञवल्क्येन संसारमार्गाद् व्युत्तिष्ठतापि प्रियाय भार्यायैक्योंकि संसार-मार्गसे निवृत्त होते हुए भी याज्ञवल्क्यजीने अपनी प्रेयसी भार्या-