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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

५९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

Page 606Permalink
५९८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| भवति। निरुपाधिर्निरुपाख्यः अनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघनोऽजोऽजरोऽमृतोऽभयोऽचलो नेति नेत्यस्थूलोऽणुरित्येवंविशेषणो भवति। | तथा उपाधिशून्य, संज्ञाशून्य, अन्तर-बाह्यशून्य, पूर्ण, प्रज्ञानघन, अजन्मा, अजर, अमर, अभय, अचल, नेति-नेति तथा अस्थूल और असूक्ष्म इत्यादि विशेषणोंवाला हो जाता है। |
| तमेतमर्थमजानन्तस्तार्किकाः केचित् पण्डितम्मन्याश्चागमविदः शास्त्रार्थं विरुद्धं मन्यमाना विकल्पयन्तो मोहमगाधमुपयान्ति। तमेतमर्थमेतौ मन्त्रावनुवदतः— “अनेजदेकं मनसो जवीयः”^१ (ई० उ० ४) “तदेजति तन्नैजति”^२ (ई० उ० ५) इति। तथा च तैत्तिरीयके— “यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चित्” (तै० आर० १०। १०। २०) “एतत्साम गायन्नास्ते” (तै० उ० ३। १०। ५) “अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्” (तै० उ० ३। १०। ६) इत्यादि। तथा च छान्दोग्ये “जक्षत् क्रीडन्रममाणः” (८। १२। ३) “स यदि पितृलोककामः” (८। २। १) “सर्वगन्धः सर्वरसः” (३। | किंतु इस अर्थको न जाननेवाले कुछ तार्किक और अपनेको पण्डित माननेवाले लोग शास्त्रके तात्पर्यको इससे विपरीत मानकर विविध प्रकारकी कल्पना करते हुए अगाध मोहको प्राप्त होते हैं। उस इस अर्थका “अनेजदेकं मनसो जवीयः”^१ तथा “तदेजति तन्नैजति”^२ ये दो मन्त्र अनुवाद करते हैं। तथा तैत्तिरीय-श्रुतिमें भी कहा है— “जिससे पर और अपर कुछ भी नहीं है”, तथा “ब्रह्मवेत्ता यह सामगान करता रहता है—” “मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ—” इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्में कहा है— “हँसता, खेलता और रमण करता हुआ [अपने शरीरकी सुधि न रखते हुए विचरता है]”, “वह यदि पितृलोककी कामना करनेवाला होता है [तो उसके संकल्पसे ही पितर वहाँ उपस्थित हो जाते हैं]”, “सर्वगन्ध, सर्वरस” इत्यादि। आथर्वण |


१. वह आत्मतत्त्व अपने स्वरूपसे विचलित न होनेवाला एक और मनसे भी अधिक वेगवान् है।
२. वह चलता है और नहीं भी चलता।