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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

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३२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
संस्कृतहिन्दी
ज्जन्मान्तरसम्बन्ध्यात्मास्तित्वे जन्मान्तरेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारोपायविशेषे च शास्त्रं प्रवर्तते। “येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके” (क० उ० १ । १ । २०)- इत्युपक्रम्य “अस्तीत्येवोपलब्धव्यः” (क० उ० २ । ३ । १३) इत्येवमादिनिर्णयदर्शनात्। “यथा च मरणं प्राप्य” (क० उ० २ । २ । ६) इत्युपक्रम्य “योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः। स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्” (क० उ० २ । २ । ७) इति च। “स्वयञ्ज्योतिः” (बृ० उ० ४ । ३ । ६) इत्युपक्रम्य “तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते” (४ । ४ । २) “पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन” (३ । २ । १३) इति च। “ज्ञपयिष्यामि” (बृ० उ० २ । १ । १५) इत्युपक्रम्य “विज्ञानमयः”जन्मान्तर--सम्बन्धी आत्माके अस्तित्व और जन्मान्तरकी इष्टप्राप्ति एवं अनिष्टनिवृत्तिके उपायविशेषका निरूपण करनेमें प्रवृत्त होता है। जैसा कि [श्रुतिमें] “मृत मनुष्यके विषयमें जो ऐसी शङ्का होती है कि कोई तो कहते हैं [शरीरादिसे अतिरिक्त देहान्तरसम्बन्धी] आत्मा रहता है और कोई कहते हैं यह नहीं रहता” इस प्रकार उपक्रम करके “आत्मा है—ऐसा ही जानना चाहिये” इत्यादि निर्णय देखा जाता है तथा “[ब्रह्मको न जाननेसे] मरणको प्राप्त होनेपर आत्मा जैसा हो जाता है” इस प्रकार आरम्भ करके “जिसने जैसा कर्म किया है तथा जिसने जैसा शास्त्रज्ञान प्राप्त किया है उसके अनुसार कोई तो देह धारण करनेके लिये किसी योनिको प्राप्त हो जाते हैं और कोई स्थावर हो जाते हैं” इस प्रकार कहा है। एवं “स्वयं प्रकाश है” इस प्रकार आरम्भ कर “ज्ञान और कर्म उसके जन्मान्तरके आरम्भक होते हैं” तथा “वह पुण्यकर्मसे पुण्यवान् और पापकर्मोंसे पापमय होता है” इत्यादि कहा गया है। इसी प्रकार “बतलाऊँगा” ऐसा उपक्रम कर “आत्मा विज्ञान-