बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२८५
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२८५
| स होवाच गौतमो भवतापि विज्ञायते ह ममास्ति सः। न तेन प्रार्थितेन कृत्यं मम यं त्वं दित्ससि मानुषं वरम्, यस्मान्ममाप्यस्ति हिरण्यस्य प्रभूतस्यापात्तं प्राप्तं गोअश्वानाम्—अपात्तमस्तीति सर्वत्रानुषङ्गः; दासीनां प्रवाराणां परिवाराणां परिधानस्य च; न च यन्मम विद्यमानम्, तत् त्वत्तः प्रार्थनी˙ त्वया वा देयम्। प्रतिज्ञातश्च वरस्त्वया त्वमेव जानीषे यदत्र युक्तं प्रतिज्ञा रक्षणीया तवेति।<br><br>मम पुनरयमभिप्रायो मा भून्नोऽस्मानभ्यस्मानेव केवलान् प्रति भवान् सर्वत्र वदान्यो भूत्वा अवदान्यो मा भूत् कदर्यो मा भूदित्यर्थः। बहोः प्रभूतस्यानन्तस्यानन्तफलस्येत्येतत्, अपर्यन्तस्यापरिसमाप्तिकस्य पुत्रपौत्रादिगामिकस्येत्येतत्, ईदृशस्य वित्तस्य मां प्रत्येव केवलमदाता | उस गौतमने कहा, 'आप भी जानते हैं, वह तो मेरे पास है ही। आप जिस मनुष्यसम्बन्धी वरको मुझे देना चाहते हैं, उसके मांगनेसे तो मेरा कोई प्रयोजन है नहीं, क्योंकि मुझे भी बहुत-सा सुवर्ण प्राप्त है तथा गो-अश्वादिकी भी प्राप्ति है—इस प्रकार 'अपात्तम् अस्ति' इस क्रियापदका सर्वत्र सम्बन्ध लगाना चाहिये। अर्थात् दासी, परिवार और वस्त्र—इन सबकी मुझे भी प्राप्ति है। जो मेरे पास नहीं है, वही मुझे आपसे माँगना चाहिये और वही आपको देना भी चाहिये। आपने वर देनेकी प्रतिज्ञा तो की ही है, अब यहाँ क्या करना उचित है—यह आप ही जानें; आपको प्रतिज्ञाका पालन तो करना ही चाहिये।'<br><br>मेरा तो यह अभिप्राय है कि आप सर्वत्र दाता होकर भी हमारे प्रति ही, अर्थात् केवल हमारे लिये ही अदात न हों--कृपण न हों। 'बहोः'--बहुत-सी, 'अनन्तस्य'--अनन्त फलवाली, 'अपर्यन्तस्य'--समाप्त न होनेवाली अर्थात् पुत्र-पौत्रादिकोंमें भी जानेवाली--इस प्रकारकी सम्पत्तिके दाता होकर भी आप केवल मेरे |