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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

Page 92Permalink
८६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| मेकैव देवता भवति मृत्युरेव फलरूपः।<br><br>यः पुनरेवमेनमश्वमेधं मृत्युमेकां देवतां वेद। अहमेव मृत्युरस्म्यश्वमेध एका देवता मद्रूपा अश्वाग्निसाधनसाध्येति सोऽपजयति पुनर्मृत्युं पुनर्मरणं सकृन्मृत्वा पुनर्मरणाय न जायत इत्यर्थः। अपजितोऽपि मृत्युरेनं पुनराप्नुयादित्याशङ्क्याह—नैनं मृत्युराप्नोति। कस्मात्? मृत्युरस्य एवंविद आत्मा भवति। किञ्च मृत्युरेव फलरूपः सन्ने-तासां देवतानामेको भवति। तस्यैतत् फलम् ॥ ७ ॥ | उत्तरकालमें भी एक ही देवता अर्थात् फलरूप मृत्यु ही हो जाता है।<br><br>जो इस प्रकार इस अश्वमेधको मृत्युरूप एक देवता जानता है; अर्थात् मैं ही अश्वमेधरूप मृत्यु हूँ—अग्नि और अश्वरूप साधनसे सिद्ध होनेवाली एक देवता मेरा ही रूप है—ऐसी जो उपासना करता है वह पुनर्मृत्युको जीत लेता है। तात्पर्य यह है कि एक बार मरकर वह पुनः मरनेके लिये उत्पन्न नहीं होता। इस प्रकार परास्त हो जानेपर भी मृत्यु इसे पुनः प्राप्त कर लेगा—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है—इसे मृत्यु पुनः प्राप्त नहीं कर सकता। क्यों? क्योंकि इस प्रकार जाननेवालेका मृत्यु आत्मा हो जाता है। बल्कि मृत्यु ही फलरूप होकर इन देवताओंमेंसे कोई एक हो जाता है। उस उपासकको यही फल प्राप्त होता है ॥ ७ ॥ |


इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये
द्वितीयमग्निब्राह्मणम् ॥ २ ॥