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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

३६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

Page 370Permalink
३६४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| स्येवारनेम्यादि । तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानिं सर्वस्वापहरणं जीयते हीयते ग्लानिं प्राप्नोति, आत्मना चक्रनाभिस्थानीयेन चेद्यदि जीवति प्रधिना बाह्येन परिवारेणायमगात्क्षीणोऽयं यथा चक्रमरनेमिविमुक्तमेवमाहुः। जीवंश्चेद् अरनेमिस्थानीयेन वित्तेन पुनरुपचीयत इत्यभिप्रायः ॥ १५ ॥ | कि पहियेके अरे और नेमि आदि । अतः यद्यपि सर्वज्यानि—सर्वस्वापहरण होनेसे पुरुष हीन हो जाता—ग्लानिको प्राप्त हो जाता है, तथापि यदि वह चक्रकी नाभिस्थानीय अपने देहपिण्डसे जीवित है तो लोग यही कहते हैं कि यह प्रधि यानी बाह्य परिवारसे चला गया अर्थात् क्षीण हो गया, जिस प्रकार कि अरे और नेमिसे रहित चक्र । तात्पर्य यह है कि यदि वह जीवित रहता है तो रथकी नेमिरूप धनसे फिर भी वृद्धि-को प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥ |


लोकत्रयकी प्राप्तिके साधन तथा देवलोककी उत्कृष्टताका वर्णन

एवं पाङ्क्तेन दैववित्तविद्यासंयुक्तेन कर्मणाऽन्नात्मकः प्रजापतिर्भवतीति व्याख्यातम् । अनन्तरं च जायादिवित्तं परिवारस्थानीयमित्युक्तम् । तत्र पुत्रकर्मापरविद्यानां लोकप्राप्तिसाधनत्वमात्रं सामान्येनावगतम्, न पुत्रादीनां लोकप्राप्तिफलं प्रति विशेषसम्बन्धनियमः । सोऽयं पुत्रादीनां साधनानां साध्यविशेषसम्बन्धो वक्तव्य इत्युत्तरकण्डिका प्रणीयते—इस प्रकार दैववित्त और विद्यासंयुक्त पाङ्क्तकर्मके द्वारा प्रजापति अन्नत्रयरूप है—इसकी व्याख्या कर दी गयी । उसके पीछे परिवारस्थानीय स्त्री आदि वित्तका वर्णन किया गया । वहाँ पुत्र, कर्म और अपरविद्याका सामान्यरूपसे लोकप्राप्तिमें साधन होनामात्र विदित होता है; पुत्रादिका लोकप्राप्तिरूप फलके प्रति विशेष सम्बन्ध होनेका नियम नहीं जान पड़ता। वह पुत्रादि साधनोंका साध्यविशेषोंके साथ सम्बन्ध बतलाना है—इसीलिये आगेकी कण्डिका रची जाती है—