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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [११११

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [११११


सह पठितस्य पारिव्राज्यस्य आत्मलोकप्राप्तिसाधनत्वेनार्थवादत्वमयुक्तम् ।प्रकार उनके साथ ही पढ़े गये पारिव्राज्य (संन्यास) का भी आत्मलोककी प्राप्तिका साधन होनेके कारण अर्थवाद होना उचित नहीं है।
फलविभागोपदेशाच्च; 'एतमेवात्मानं लोकं विदित्वा' इति अन्यस्माद् बाह्याद् लोकादात्मानं फलान्तरत्वेन प्रविभजति, यथा "पुत्रेणैवायं लोको जय्यो नान्येन कर्मणा, कर्मणा पितृलोकः" ( १ । ५ । १६ ) इति ।फलविभागका उपदेश दिये जानेके कारण भी यह स्तुत्यर्थक नहीं है। 'इस आत्मलोकको ही जानकर' इस वाक्यसे श्रुति अन्य लोकोंसे आत्माका फलान्तररूपसे विभाग करती है, जिस प्रकार कि "यह लोक पुत्रसे ही प्राप्तव्य है, किसी अन्य कर्मसे नहीं तथा कर्मसे पितृलोक प्राप्तव्य है" इस वाक्यद्वारा पुत्रादि साधनोंका फलविभाग किया गया है।
न च प्रव्रजन्तीत्येतत् प्राप्तवल्लोकस्तुतिपरम्, प्रधानवच्चार्थ-इसके सिवा प्रमाणान्तरसे प्राप्त [वायु आदि] के समान भी 'प्रव्रजन्ति' यह वाक्य स्तुतिपरक (अर्थवाद ¹) नहीं हो सकता। तथा अन्य प्रधान कर्मोंके समान इसे

१. अर्थवाद तीन तरहके होते हैं—गुणवाद, अनुवाद और भूतार्थवाद। जहाँ अन्य प्रमाणोंसे विरोध हो वह गुणवाद कहलाता है। जैसे 'आदित्यो यूपः' इत्यादि वाक्य यहाँ यूप (पशु बाँधनेके लिये स्थापित काष्ठ) को सूर्य कहा है, जो प्रत्यक्ष अनुभवके विरुद्ध है। इसी प्रकार जो अन्य प्रमाणोंद्वारा ज्ञात अर्थका बोध करानेवाला है, उसे अनुवाद कहते हैं। जैसे 'अग्निर्हिमस्य भेषजम्' (अग्नि शीतकी दवा है) इत्यादि। अग्निसे शीतका कष्ट दूर होना प्रत्यक्ष है। इसके सिवा जो अन्य प्रमाणोंसे न तो ज्ञात हो और न विरुद्ध ही हो, उस अर्थका बोधक वाक्य भूतार्थवाद कहलाता है। जैसे 'इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छत्' (इन्द्रने वृत्रासुरको मारनेके लिये वज्र उठाया) इत्यादि।