बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 653 of 1402
Read in context| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६४३ |
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| इतर आहैकयेति । एका सा देवता यया दक्षिणतः स्थित्वा ब्रह्मा आसने यज्ञं गोपायति । कतमा सैकैति । मन एवेति, मनः सा देवता । मनसा हि ब्रह्मा व्याप्रियते ध्यानेनैव । “तस्य यज्ञस्य मनश्च वाक्च वर्तनी तयोरन्यतरां मनसा संस्क-रोति ब्रह्मा” (छा० उ० ४ । १६ । १) इति श्रुत्यन्तरात् । तेन मन एव देवता तया मनसा हि गोपायति ब्रह्मा यज्ञम् ।<br><br>तच्च मनो वृत्तिभेदेनानन्तम् । वैशब्दः प्रसिद्धार्थद्योतनार्थः । प्रसिद्धं मनस आनन्त्यम् । तदा-नन्त्याभिमानिनो देवाः, अनन्ता वै विश्वे देवाः । “सर्वे देवा यत्रैकं भवन्ति” इत्यादिश्रुत्यन्त-रात् । तेन आनन्त्यसामान्यादन-न्तमेव स तेन लोकं जयति ॥९॥ | इसपर (याज्ञवल्क्य) कहते हैं, 'एकया इति; जिसके द्वारा दक्षिणकी ओर आसनपर बैठकर ब्रह्मा यज्ञकी रक्षा करता है, वह देवता एक है।' 'वह एक देवता कौन है?' इसपर कहते हैं—वह मन ही है—वह देवता मन ही है। मनके द्वारा ध्यान करके ही ब्रह्मा अपना कार्य करता है। “उस यज्ञके मन और वाक्—ये दो मार्ग हैं, उनमेंसे एक (वाक्) का संस्कार ब्रह्मा मन यानी मौनसे करता है” इस अन्य श्रुतिसे भी यही कहा गया है। अतः मन ही देवता है, उस मनसे ही ब्रह्मा यज्ञकी रक्षा करता है।<br><br>और वह मन वृत्तिभेदसे अनन्त है। 'वै' शब्द प्रसिद्ध अर्थका द्योतन करनेके लिये है। मनका अनन्तत्व प्रसिद्ध है। उस अनन्तत्वके अभि-मानी जो देव हैं, वे सम्पूर्ण देव भी अनन्त हैं। “जिस मनमें समस्त देव एक (अभिन्न) हो जाते हैं” इत्यादि अन्य श्रुतिसे भी यही प्रकट होता है। अतः अनन्ततामें समानता होनेके कारण वह उसके द्वारा अनन्तलोकको ही जीत लेता है ॥६॥ |