संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३४१
पृष्ठ 347स्थायी लिंक
ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३४१
| यो वा एताम् अक्षितिम् अक्षयहेतुं <br><br> यथोक्तं वेद, पुरुषो वा अक्षितिः <br><br> स हीदमन्नं धिया धिया जनयते <br><br> कर्मभिर्यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयत हेति। | किया जाता है—जो भी इस अक्षिति अर्थात् ऊपर बतलाये हुए अक्षयके हेतुको कि 'पुरुष ही अक्षिति है, वही तत्तद्बुद्धि और कर्मोंसे इस अन्नको उत्पन्न करता है, यदि वह उत्पन्न न करे तो यह निश्चय क्षीण हो जाय' ऐसा जानता है, [ वह प्रतीकके द्वारा अन्न भक्षण करता है ]। |
| सोऽन्नमत्ति प्रतीकेनेत्यस्यार्थ उच्यते—मुखं मुख्यत्वं प्राधान्यमित्येतत् । प्राधान्येनैवान्नानां पितुः पुरुषस्याक्षितित्वं यो वेद सोऽन्नमत्ति नान्नं प्रति गुणभूतः सन्। यथाज्ञो न तथा विद्वानन्नानामात्मभूतः, भोक्तैव भवति, न भोज्यतामापद्यते । स देवानपिगच्छति स ऊर्जमुपजीवति, देवानपिगच्छति देवात्मभावं प्रतिपद्यते; ऊर्जममृतं चोपजीवतीति यदुक्तं सा प्रशंसा, नापूर्वार्थोऽन्योऽस्ति ॥ २ ॥ | अब 'सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन' इस श्रुतिका अर्थ कहा जाता है—मुख—मुख्यत्व अर्थात् प्राधान्यको कहते हैं। जो पुरुष अन्नोंके पिता पुरुषका अक्षितित्व जानता है, वह प्रधानतासे ही अन्न भक्षण करता है, अन्नके प्रति गौण होकर नहीं। अज्ञानीकी तरह ज्ञानवान् अन्नोंका आत्मभूत नहीं होता; वह भोक्ता ही रहता है, भोज्यताको प्राप्त नहीं होता। तथा 'स देवानपिगच्छति स ऊर्जमुपजीवति' वह 'देवानपिगच्छति'—देवात्मभावको प्राप्त होता है और ऊर्जं यानी अमृतका उपजीवी होता है—ऐसा जो कहा है वह उसकी प्रशंसा है, इसका कोई दूसरा अपूर्व अर्थ नहीं है ॥ २ ॥ |