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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१०५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०५८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
अथ कदाचिदेवाभिव्यज्यते, उपलब्धिव्यवधानादनात्मभूतं तदिति, अन्यतोऽभिव्यक्तिप्रसङ्गः। तथा चाभिव्यक्तिसाधनापेक्षता। उपलब्धिसमानाश्रयत्वे तु व्यवधानकल्पनानुपपत्तेः सर्वदाभिव्यक्तिरनभिव्यक्तिर्वा। न त्वन्तरालकल्पनायां प्रमाणमस्ति। न च समानाश्रयाणामेकस्यात्मभूतानां धर्माणामितरेतरविषयविषयित्वं सम्भवति।और यदि वह कभी-कभी ही अभिव्यक्त होता है तो उसकी उपलब्धिमें व्यवधान रहनेके कारण वह अनात्मभूत है; तब तो उसकी दूसरे (साधन) से अभिव्यक्ति होनेका प्रसङ्ग उपस्थित होता है और इस प्रकार अभिव्यक्तिके साधनकी भी अपेक्षा हो जाती है। यदि उपलब्धिसमानाश्रयत्व माना जाय^१ तो व्यवधानकी कल्पना न हो सकनेके कारण या तो उसकी सर्वदा अभिव्यक्ति ही होगी या अनभिव्यक्ति ही। इन दोनोंके बीचकी कल्पनामें कोई प्रमाण नहीं हैं। एक ही आश्रयवाले अर्थात् एकहीके आत्मभूत धर्मोंका परस्पर विषय-विषयीभाव होना सम्भव नहीं।
आत्मनो बन्धमोक्ष-विचारः<br>विज्ञानसुखयोश्च प्रागभिव्यक्तेः संसारित्वम्, अभिव्यक्त्युत्तरकालं च मुक्तत्वं यस्य-सोऽन्यः परमान्नित्याभिव्यक्तज्ञानस्वरूपादत्यन्तवैलक्षण्यात्, शैत्यमिवौष्ण्यात्;पूर्व०—विज्ञान और आनन्दकी अभिव्यक्तिसे पूर्व जिसका संसारित्व और अभिव्यक्तिके पश्चात् मुक्तत्व बतलाया जाता है, वह अत्यन्त विलक्षण होनेके कारण नित्याभिव्यक्तज्ञानस्वरूप परमात्मासे भिन्न है, जैसे उष्णतासे शीतलता।

१. अर्थात् उपलब्धि और उपलब्धिके विषय विज्ञान एवं आनन्द—इन दोनोंका एक आत्मा ही आश्रय है—ऐसा माना जाय।