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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१०६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४

१०६२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| मात्मनः कर्मभूतमुपलभमान उपलब्धृधर्मत्वेन गृह्णाति—शरीरे कार्श्यरूपादिवत्, तथा। | को अपना कर्मभूत अनुभव करनेवाला उसे शरीरान्तर्गत कृशता और रूपादिके समान साक्षीके धर्मरूपसे नहीं ग्रहण करता। |
| सुखदुःखेच्छाप्रयत्नादीन् सर्वो लोको गृह्णातीति चेत् ! | पूर्व०—सुख-दुःख, इच्छा और प्रयत्नादि [आत्माके धर्मों] को तो सभी लोग ग्रहण करते हैं ! |
| तथापि ग्रहीतुलौंकस्य विविक्ततैवाभ्युपगता स्यात्। 'न जानेऽहं त्वदुक्तं मुग्ध एव,' इति चेद् भवत्वज्ञो मुग्धः, यस्तु एवंदर्शी, तं ज्ञम् अमुग्धं प्रतिजानीमहे वयम्। तथा व्यासेनोक्तम्—'इच्छादि कृत्स्नं क्षेत्रं क्षेत्री प्रकाशयति' इति, "समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्। विनश्यत्स्वविनश्यन्तम्—" (गीता १३। २७) इत्यादि शतश उक्तम्। तस्मान्नात्मनः स्वतो बद्धमुक्तज्ञानाज्ञानकृतो विशेषोऽस्ति, सर्वदा समैकरसस्वाभाव्याभ्युपगमात्। | सिद्धान्ती—इस प्रकार भी ग्रहण करनेवाले पुरुषकी पृथक्ता ही स्वीकार की जाती है। और तुमने जो कहा कि 'मैं नहीं जानता, मुग्ध ही हूँ', सो तुम भले ही अज्ञ या मुग्ध रहो, किंतु जो इस प्रकार देखनेवाला है वह तो ज्ञाता और अमुग्ध ही है—ऐसी हमारी प्रतिज्ञा है। व्यासजीने भी ऐसा ही कहा है कि 'क्षेत्री (आत्मा) इच्छादि सम्पूर्ण क्षेत्रोंको प्रकाशित करता है।' "समस्त भूतोंमें समानरूपसे स्थित और उनके नष्ट होनेपर भी नष्ट न होनेवाले परमेश्वरको" इत्यादि सैकड़ों प्रकारसे उसका वर्णन किया गया है। अतः स्वयं आत्माकी बद्धमुक्त एवं ज्ञान-अज्ञानके कारण कोई विशेषता नहीं होती; क्योंकि उसे सर्वदा समान और एकरसस्वरूप माना गया है। |