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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
३६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
Page 374Permalink
| ३६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| सम्प्रत्तिः सम्प्रदानम्; सम्प्रत्तिरिति वक्ष्यमाणस्य कर्मणो नामधेयम्। पुत्रे हि स्वात्मव्यापारसम्प्रदानं करोत्यनेन प्रकारेण पिता, तेन सम्प्रत्तिसंज्ञकमिदं कर्म। तत्कस्मिन्काले कर्तव्यम् ? इत्याह—स पिता यदा यस्मिन् काले प्रैष्यन् मरिष्यन् मरिष्यामीत्यरिष्टादिदर्शनेन मन्यते, अथ तदा पुत्रमाहूयाह—त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति। स एवमुक्तः पुत्रः प्रत्याह; स तु पूर्वमेवानुशिष्टो जानाति मयैतत्कर्तव्यमिति, तेनाह—अहं ब्रह्माहं यज्ञोऽहं लोक इति। एतद्वाक्यत्रयम्। | ‘सम्प्रत्ति’ सम्प्रदानको कहते हैं। ‘सम्प्रत्ति’ यह आगे कहे जानेवाले कर्मका नाम है। पिता पुत्रमें अपने व्यापारका इस प्रकारसे सम्प्रदान करता है, इसलिये यह कर्म ‘सम्प्रत्ति’ नामवाला है। उसे किस समय करना चाहिये ? इसपर श्रुति कहती है—वह पिता जिस समय करनेको होता है अर्थात् अरिष्ट (मरणके पूर्वचिह्न) आदि देखकर यह समझता है कि ‘अब मैं मरूँगा’, उस समय पुत्रको बुलाकर इस प्रकार कहता है—‘तू ब्रह्म है, तू यज्ञ है, तू लोक है।’ इस प्रकार कहे जानेपर वह पुत्र उत्तरमें कहता है। वह शिक्षित होनेके कारण पहलेसे ही जानता है कि मुझे यह करना चाहिये, इसलिये कहता है—‘मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं लोक हूँ।’ ये तीन पृथक्-पृथक् वाक्य हैं। |
| एतस्यार्थस्तिरोहित इति मन्वाना श्रुतिर्व्याख्यानाय प्रवर्तते—यद्वै किञ्च यत्किञ्चावशिष्टमनूक्तमधीतमनधीतं च, तस्य सर्वस्यैव ब्रह्मेत्येतस्मिन्पदे एकता एकत्वम्, योऽध्ययनव्यापारो मम कर्तव्य आसीदेतावन्तं कालं | इन वाक्योंका अर्थ गूढ है—ऐसा समझकर श्रुति इसकी व्याख्या करनेके लिये प्रवृत्त होती है—जो कुछ भी अवशिष्ट—अनूक्त अर्थात् अध्ययन किया हुआ और अध्ययन नहीं किया हुआ है, उस सभीकी ‘ब्रह्म’ इस पदमें एकता है। तात्पर्य यह है कि जो वेदविषयक स्वाध्याय-कार्य इतने समयतक मेरे लिये कर्तव्य |