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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
| ७०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
Page 714Permalink
| ७०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| भवति—लौकिकी पारमार्थिकी चेति; तत्र लौकिकी चक्षुःसंयुक्ता अन्तःकरणवृत्तिः, सा क्रियत इति जायते विनश्यति च; या त्वात्मनो दृष्टिः—अग्न्युष्णप्रकाशादिवत्, सा च द्रष्टुः स्वरूपत्वान्न जायते न विनश्यति च। सा क्रियमाणयोपाधिभूतया संसृष्टे वेति, व्यपदिश्यते—द्रष्टेति, भेदवच्च—द्रष्टा दृष्टिरिति च; | लौकिकी और पारमार्थिकी; उनमें चक्षुसे संयुक्त जो अन्तःकरणकी वृत्ति है वह लौकिकी दृष्टि है; वह की जाती है, इसलिये उत्पन्न होती है और नष्ट भी होती है; किंतु जो अग्निके उष्णत्व और प्रकाशादिके समान आत्माकी दृष्टि है, वह द्रष्टाका स्वरूप होनेके कारण न उत्पन्न होती है और न नष्ट होती है। वह क्रियमाण उपाधिभूता दृष्टिसे संसर्गयुक्त-सी है, इसलिये आत्मा 'द्रष्टा' कहा जाता है। तथा द्रष्टा, दृष्टि ऐसा भेदवत् व्यवहार होता है। |
| याऽसौ लौकिकी दृष्टिश्चक्षुर्द्वारा रूपोपरक्ता जायमानैव नित्यया आत्मदृष्ट्या संसृष्टेव, तत्प्रतिच्छाया—तया व्याप्तैव जायते तथा विनश्यति च; तेनोपचर्यते द्रष्टा सदा पश्यन्नपि—पश्यति न पश्यति चेति; न तु पुनर्द्रष्टुर्दृष्टेः कदाचिदप्यन्यथात्वम्; तथा च वक्ष्यति षष्ठे “ध्यायतीव लेलायतीव” | और यह जो लौकिकी दृष्टि है वह मानो चक्षुद्वारा रूपसे संश्लिष्ट-सी ही उत्पन्न होनेवाली है; वह नित्य आत्मदृष्टिसे संसृष्ट-सी, उसकी प्रतिच्छाया और उससे व्याप्त ही उत्पन्न होती और विनाशको प्राप्त होती है। उसीके कारण, सर्वदा देखनेवाला होनेपर भी द्रष्टाके विषयमें 'वह देखता है, नहीं देखता है' ऐसा उपचार किया जाता है; किंतु द्रष्टाकी दृष्टिमें कभी अन्यथात्व नहीं होता; ऐसा छठे (उपनिषद्के चौथे) अध्यायमें कहेंगे भी—“मानो ध्यान करता हुआ, मानो चेष्टा करता |