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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१२०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५

१२०६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

कारके उपजीवी देवगण हैं, हन्तकारके उपजीवी मनुष्य हैं और स्वधाकारके पितृगण। उस धेनुका प्राण वृषभ है और मन बछड़ा है ॥ १ ॥

| वागिति शब्दत्रयी तां वाचं धेनुं धेनुरिव धेनुर्यथा धेनुश्चतुर्भिः स्तनैः स्तन्यं पयः क्षरति वत्सायैवं वाग्धेनुर्वक्ष्यमाणैः स्तनैः पय इवान्नं क्षरति देवादिभ्यः। के पुनस्ते स्तनाः ? के वा ते येभ्यः क्षरति ? | वाक् यह शब्द अर्थात् त्रयी (तीन वेद—ऋक्, यजुः और साम) है; उस वाक्रूप धेनुकी जो उपासना करे, जो धेनुके सामान धेनु है। जिस प्रकार धेनु अपने चार स्तनोंसे बछड़ेके लिये स्तन्य अर्थात् दूध बहाती है, उसी प्रकार वाग्धेनु आगे बतलाये जानेवाले स्तनोंसे देवादिके लिये दूधके समान अन्न प्रकट करती है। वे स्तन कौन-से हैं ? और जिनके लिये वह दूध देती है, वे भी कौन-कौन हैं ? |
| तस्या एतस्या वाचो धेन्वा द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति वत्सस्थानीयाः। कौ तौ ? स्वाहाकारं च वषट्कारं च; आभ्यां हि हविर्दीयते देवेभ्यः। हन्तकारं मनुष्याः—हन्तेति मनुष्येभ्योऽन्नं प्रयच्छन्ति। स्वधाकारं पितरः—स्वधाकारेण हि पितृभ्यः स्वधां प्रयच्छन्ति। | उस इस वाक्रूपी धेनुके दो स्तनोंके वत्सस्थानीय देवगण उपजीवी हैं। वे दो स्तन कौन-से हैं ? स्वाहाकार और वषट्कार; क्योंकि इन्हींके द्वारा देवताओंको हवि दी जाती है। हन्तकारके उपजीवी मनुष्य हैं, 'हन्त' ऐसा कहकर मनुष्योंको अन्न देते हैं। स्वधाकारके उपजीवी पितृगण हैं—स्वधाकारके द्वारा ही पितृगणको स्वधा (श्राद्धीय वस्तु) देते हैं। |
| तस्या धेन्वा वाचः प्राण ऋषभः, प्राणेन हि वाक् प्रसूयते। मनो वत्सः, मनसा हि प्रस्त्राव्यते | उस धेनुरूप वाणीका प्राण वृषभ है, क्योंकि प्राणके द्वारा ही वाक् प्रसव करती है। मन उसका वत्स है, क्योंकि मनसे ही वह प्रस्त्रावित |