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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

५३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

Page 536Permalink
५३०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| न च विज्ञानात्मा परमात्मनो वस्त्वन्तरम् तथा कल्पनायां सिद्धान्तहानात् । तस्माद् वेदार्थमूढानां स्वचित्तप्रभावा एवमादिकल्पना अक्षरबाह्याः; न ह्यक्षरबाह्यो वेदार्थो वेदार्थोपकारी वा, निरपेक्षत्वाद् वेदस्य प्रामाण्यं प्रति; तस्माद्राशित्रयकल्पना असमञ्जसा । | भी नहीं की जा सकती। और विज्ञानात्मा परमात्मासे कोई भिन्न वस्तु भी नहीं है, क्योंकि ऐसी कल्पना करनेमें तो अद्वैतसिद्धान्तकी ही हानि होती है। अतः वेदार्थसे अनभिज्ञ उन पुरुषोंकी ऐसी मनमानी कल्पना वेदाक्षरोंसे बाह्य है और अक्षरोंको छोड़कर किया हुआ अर्थ वास्तविक वेदार्थ अथवा वेदार्थमें उपयोगी नहीं हो सकता; क्योंकि अपने प्रामाण्यमें वेद किसीकी अपेक्षा नहीं रखता; अतः राशित्रयकी कल्पना ठीक नहीं है। |
| ‘योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः’ प्रकृतपरामर्शः इति लिङ्गात्मा प्रस्तुतोऽध्यात्मे, अधिदैवे च ‘य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः’ इति, ‘तस्य’ इति प्रकृतोपादानात्स एवोपादीयते योऽसौ त्यस्यामूर्तस्य रसो न तु विज्ञानमयः । | ‘यह जो दक्षिण नेत्रान्तर्गत पुरुष है’ इस वाक्यद्वारा अध्यात्म-प्रकरणमें लिङ्गात्माका वर्णन आरम्भ किया गया है तथा अधिदैव-प्रकरणमें ‘यह जो इस आदित्यमण्डलमें पुरुष है’ इस प्रकार ‘तस्य’ इस पदसे प्रकृत [ लिङ्गात्मा ] का ग्रहण किये जानेके कारण वही ग्रहण किया गया है जो कि यह अमूर्त त्यत्का रस है, विज्ञानमयका ग्रहण नहीं किया गया। |
| ननु विज्ञानमयस्यैवैतानि रूपाणि कस्मान्न भवन्ति ? विज्ञानमयस्यापि प्रकृतत्वात्, ‘तस्य’ इति च प्रकृतोपादानात् । | पूर्व०-यहाँ विज्ञानमयका भी प्रकरण है, इसलिये ये विज्ञानमयके ही रूप क्यों नहीं हैं ? क्योंकि ‘तस्य’ इस पदसे तो प्रकृतका ही ग्रहण किया गया है। |