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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

७१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३

७१०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

व्याचक्ष्वेत्येष त आत्मा सर्वान्तरः । कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति । एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः । तस्माद् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् । बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिर्मौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः स ब्राह्मणः केन स्याद् येन स्यात् तेनेदृश एवातोऽन्यदार्तं ततो ह कहोलः कौषीतकेय उपरराम ॥ १ ॥

फिर इस याज्ञवल्क्यसे कौषीतकेय कहोलने पूछा; उसने 'हे याज्ञवल्क्य!' इस प्रकार सम्बोधित करके कहा—'जो भी साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा है, उसकी तुम मेरे प्रति व्याख्या करो।' [ यह सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा ] 'यह तुम्हारा आत्मा सर्वान्तर है।' [कहोल-] 'याज्ञवल्क्य ! यह सर्वान्तर कौन-सा है?' [ याज्ञवल्क्य-] 'जो क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह, जरा और मृत्युसे परे है। उस इस आत्माको ही जानकर ब्राह्मण पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणासे अलग हटकर भिक्षाचर्यासे विचरते हैं। जो भी पुत्रैषणा है, वही वित्तैषणा है और जो वित्तैषणा है, वही लोकैषणा है। ये दोनों ही [ साध्य-साधनेच्छाएँ ] एषणाएँ ही हैं। अतः ब्राह्मण पाण्डित्य (आत्मज्ञान) का पूर्णतया सम्पादन कर आत्मज्ञानरूप बलसे स्थित रहनेकी इच्छा करे। फिर बाल्य और पाण्डित्यको पूर्णतया प्राप्त कर वह मुनि होता है। तथा अमौन और मौनका पूर्णतया सम्पादन करके ब्राह्मण (कृतकृत्य) होता है। वह किस प्रकार ब्राह्मण होता है? जिस प्रकार भी हो, ऐसा ही ब्राह्मण होता है; इससे भिन्न और सब आर्त (नाशवान्) है!' तब कौषीतकेय कहोल चुप हो गया ॥ १ ॥