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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१३४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६

१३४२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

| आदद इत्येवमन्तेन मन्त्रेण पुन- <br> र्मामित्येतेन निमृज्यादन्तरेण <br> मध्ये भ्रुवौ भ्रुवोर्वा स्तनौ <br> स्तनयोर्वा ॥ ५ ॥ | वीर्यको हाथमें ले। फिर 'पुनर्माम्... <br> से लेकर ......'निमृज्यात्' तक मन्त्र <br> पढ़कर उस वीर्यको दोनों <br> भौंहों अथवा स्तनोंके बीचमें <br> लगावे* ॥ ५ ॥ |

अथ यद्युदक आत्मानं पश्येत्तदभिमन्त्रयेत मयि तेज इन्द्रियं यशो द्रविणँ सुकृतमिति श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मान्मलोद्वाससं यशस्विनीमभिक्रम्योपमन्त्रयेत ॥ ६ ॥

यदि कभी भूलसे जलमें वीर्य स्खलित हो जानेपर वहां अपनी परछाईं देख ले, तब उस जलको इस प्रकार अभिमन्त्रित करे—'देवगण मुझमें तेज, इन्द्रिय (वीर्य), यश, धन और सत्कर्मकी प्रतिष्ठा करें।' [तत्पश्चात् जिसके गर्भसे पुत्र उत्पन्न करना हो उस पत्नीकी इस प्रकार स्तुति (प्रशंसा) करे—] 'यह मेरी पत्नी संसारकी समस्त स्त्रियोंमें लक्ष्मी-स्वरूपा है; क्योंकि इसके वस्त्रमें रजस्वलापनके चिह्न स्पष्ट दिखायी देते हैं।' तदनन्तर [जब वह] रजस्वला एवं यशस्विनी पत्नी [तीन रातके बाद स्नान कर ले तब उस] के पास जाकर कहे—[आज हम दोनोंको वह कार्य करना है, जिससे पुत्रकी उत्पत्ति होती है] ॥ ६ ॥

| अथ यदि कदाचिदुदक आत्मा- <br> नमात्मच्छायां पश्येत्तत्राप्यभिम- <br> न्त्रयेतानेन मन्त्रेण मयि तेज इति। | यदि कभी जलमें [वीर्य स्खलित हो जानेपर वहाँ] अपने-को—अपनी छायाको देखे तब 'मयि तेजः' इत्यादि मन्त्रसे जलको अभिमन्त्रित करे। |


* इस मन्त्रद्वारा दो कार्य किये जाते हैं—वीर्यका आदान और मार्जन। हाथमें लेना आदान है और भौंहों अथवा स्तनोंके बीचमें उसे लगाना मार्जन है। इन कार्योंकी दृष्टिसे मन्त्रके भी दो भाग हो जाते हैं। 'यन्मे' से लेकर 'आददे' तक आदान-मन्त्र है और 'पुनर्माम्' से लेकर 'निमृज्यात्' तक मार्जन-मन्त्र।