सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

२१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

२१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १


| [आत्मोपासनस्याविधेयत्वम्]<br>स्मिन्नात्मनि हि यस्मान्निरुपाधिकजलसूर्यप्रतिबिम्बभेदा इवादित्ये प्राणाद्युपाधिकृता विशेषाः प्राणादिकर्मजनामाभिधेया यथोक्ता ह्येते एकमभिन्नतां भवन्ति प्रतिपद्यन्ते ।<br><br>‘आत्मत्येवोपासीत’ इति नापूर्वविधिः । पक्षे प्राप्तत्वात् “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” (बृ० उ० ३ । ४ । १) “कतम आत्मेति—योऽयं विज्ञानमयः” (बृ० उ० ४ । ३ । ७) इत्येवमाद्यात्मप्रतिपादनपराभिः श्रुतिभिरात्मविषयं विज्ञानमुत्पादितम् । तत्रात्मस्वरूपविज्ञानेनैव तद्विषयानात्माभिमानबुद्धिः कारकादिक्रियाफलाध्यारोपणात्मिका अविद्या निवर्तिता । तस्यां निवर्तितायां कामादिदोषानुपपत्तेः | क्योंकि इस निरुपाधिक आत्मामें, जिस प्रकार जलमें पड़े हुए सूर्य-प्रतिबिम्बके भेद सूर्यमें एक हो जाते हैं उसी प्रकार, ऊपर बतलाये हुए प्राणादि कर्मजन्य नामोंसे कहे जानेवाले प्राणादि उपाधियोंके कारण होनेवाले सम्पूर्ण विशेष एक होते अर्थात् अभिन्नताको प्राप्त हो जाते हैं।<br><br>‘आत्मत्येवोपासीत’ यह अपूर्वविधि नहीं है, क्योंकि यह एक पक्षमें स्वतः प्राप्त है।¹ “जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है” “आत्मा कौन-सा है, इसपर कहते हैं—यह जो विज्ञानमय है” इस प्रकारकी आत्माका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंसे आत्मविषयक ज्ञान उत्पन्न होता है। वहाँ आत्मस्वरूपके ज्ञानसे ही उसमें होनेवाली अनात्माभिमानबुद्धि अर्थात् कारकादि क्रिया एवं फलकी अध्यारोपरूपा अविद्या निवृत्त की जाती है। उसके निवृत्त हो जानेपर कामादि दोषोंकी सम्भावना |


१. जो अर्थ अत्यन्त अप्राप्त होता है उसके लिये जो विधि की जाती है उसे अपूर्वविधि कहते हैं। जैसे 'जिसे स्वर्गकी इच्छा हो वह अग्निहोत्र करे' यहाँ अग्निहोत्र अत्यन्त अप्राप्त था, अतः उसके लिये जो विधि की गयी है वह अपूर्वविधि है। आत्मा विधिका विषय नहीं है—यह बात आगेके विचारसे स्पष्ट हो जायगी।