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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५५७

Page 565Permalink

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५५७


| शब्दत्वेऽन्तर्भावः, एवं स्थितिकाले तावत्सामान्यविशेषाव्यतिरेकाद् ब्रह्मैकत्वं शक्यमवगन्तुम् ॥ ९ ॥ | शब्दोंका शब्दत्वमें अन्तर्भाव हो जाता है, उसी प्रकार स्थितिकालमें सामान्य और विशेषसे अभिन्न होनेके कारण ब्रह्मकी एकताका ज्ञान भी हो सकता है ॥ ६ ॥ |


परमात्माके निःश्वासभूत ऋग्वेदादिका उनसे अभिन्नत्वप्रतिपादन

| एवमुत्पत्तिकाल प्रागुत्पत्तेर्ब्रह्मैवेति शक्यमवगन्तुम्। यथाग्नेर्विस्फुलिङ्गधूम्राङ्गारार्चिषां प्राग्विभागादग्निरिवेति भवत्यग्नेकत्वम्, एवं जगन्नामरूपविकृतं प्रागुत्पत्तेः प्रज्ञानघन एवेति युक्तं ग्रहीतुमित्येतदुच्यते— | इस प्रकार यह जाना जा सकता है कि उत्पत्तिकालमें उत्पत्तिसे पूर्व ब्रह्म ही था। जिस प्रकार अग्निकी चिनगारी, धूम, अंगार और ज्वालाओंका विभाग होनेसे पूर्व अग्नि ही है, अतः अग्निकी एकता सिद्ध होती है, उसी प्रकार नाम-रूप-विकारको प्राप्त हुआ जगत् उत्पत्तिसे पूर्व प्रज्ञानघन ही था—ऐसा ग्रहण करना उचित है—इसीसे यह कहा जाता है— |

स यथार्द्राग्नेरभ्याहितात्पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि निश्वसितानि ॥ १० ॥

वह [ चौथा दृष्टान्त— ] जिस प्रकार जिसका ईंधन गीला है, ऐसे आधान किये हुए अग्निसे पृथक् धुआँ निकलता है, हे मैत्रेयि ! इसी प्रकार ये जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वाङ्गिरस (अथर्ववेद), इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, मन्त्रविवरण और अर्थवाद हैं, वे इस महद्भूतके ही निःश्वास हैं ॥ १० ॥