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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

| ११८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |

११८६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ५
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
पक्तुं चेति। फलं त्वेतदात्मदोषज्ञाने सति दोषान्निवर्तयितुं शक्यतेऽल्पेनाप्युपदेशेन यथा देवादयो दकारमात्रेणेति।भी उचित ही है। इसका फल तो यही है कि अपने दोषका ज्ञान होनेपर थोड़े-से उपदेशसे भी दोषसे निवृत्त किया जा सकता है, जैसे कि दकारमात्रसे देवादिको निवृत्त कर दिया गया था।
नन्वेतत् त्रयाणां देवादीनामनुशासनं देवादिभिरप्येकैकमेवोपादेयमद्यत्वेऽपि न तु त्रयं मनुष्यैः शिक्षितव्यमिति।शङ्का—किंतु यह देवता आदि तीनोंको उपदेश किया गया और उन देवादिकोंके लिये इनमेंसे एक-एक ही उपादेय हुआ; अतः आजकल भी मनुष्योंको उन तीनोंहीके सीखनेकी आवश्यकता नहीं है।
अत्रोच्यते—पूर्वैर्देवादिभिर्विशिष्टैरनुष्ठितमेतत् त्रयं तस्मान्मनुष्यैरेव शिक्षितव्यमिति।समाधान—यहाँ कहना यह है कि पूर्ववर्ती देवता आदि विशिष्ट व्यक्तियोंने इन तीनों साधनोंका अनुष्ठान किया था, अतः मनुष्योंको भी इन्हें सीखना ही चाहिये।
तत्र दयालुत्वस्याननुष्ठेयत्वं स्यात्, कथम्? असुरैरप्रशस्तैरनुष्ठितत्वादिति चेत्।शङ्का—ऐसी स्थितिमें भी दयालुता अनुष्ठानके योग्य नहीं हो सकती; यदि कहो क्यों? तो इसलिये कि इसका नीच असुरोंद्वारा अनुष्ठान किया गया था।
न, तुल्यत्वात् त्रयाणाम्, अतोऽन्योऽत्राभिप्रायः प्रजापतेः पुत्रा देवादयस्त्रयः, पुत्रेभ्यश्च हितमेव पित्रोपदेष्टव्यम्, प्रजापतिश्च हितज्ञो नान्यथोपदिशति, तस्मात्समाधान—नहीं, क्योंकि ये तीनों समान ही हैं; अतः यहाँ इससे दूसरा अभिप्राय है—देवादि तीनों प्रजापतिके पुत्र हैं और पुत्रोंको पिताके द्वारा हितकी बातका ही उपदेश किया जाना चाहिये। प्रजापति भी उनके हितकी बात जाननेवाले हैं, इसलिये उन्हें अहितका उपदेश नहीं करते।