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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१३५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१३५२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

अथ य इच्छेत् पुत्रो मे श्यामो लोहिताक्षो जायेत त्रीन् वेदाननुब्रुवीत सर्वमायुरियादित्यौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १६ ॥

जो चाहे कि मेरा पुत्र श्याम वर्ण, अरुण नयन हो, तीन वेदोंका स्वाध्याय करे तथा पूरे सौ वर्षोंतक जीवित रहे, वह और उसकी पत्नी केवल जलमें चावल पकाकर भात तैयार कर लें और उसमें घी मिलाकर खायँ। इससे वे उक्त योग्यतावाले पुत्रको जन्म देनेमें समर्थ होते हैं ॥ १६ ॥

| केवलमेव स्वाभाविकमोदनम् । उदग्रहणमन्यप्रसङ्गनिवृत्त्यर्थम् ॥ १६ ॥ | केवल स्वाभाविक ही भात खायँ, 'उद' शब्दका प्रयोग दुग्ध आदि अन्य प्रसङ्गोंकी निवृत्तिके लिये है ॥ १६ ॥ |


अथ य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत सर्वमायुरियादिति तिलौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १७ ॥

जो चाहता हो कि मेरी पुत्री विदुषी हो और पूरे सौ वर्षोंकी आयुतक जीवित रहे, वह और उसकी पत्नी तिल और चावलकी खिचरी पकाकर उसमें घी मिलाकर खायँ। इससे वे उक्त योग्यतावाली कन्याको जन्म देनेमें समर्थ होते हैं ॥ १७ ॥

| दुहितुः पाण्डित्यं गृह्तन्त्रविषयमेव वेदेऽनधिकारात् । तिलौदनं कृशरम् ॥ १७ ॥ | गृहशास्त्रमें निपुण होना ही पुत्रीका पाण्डित्य है; क्योंकि वेदमें उसका अधिकार नहीं है। तिलौदनका अर्थ है तिल-चावलकी खिचड़ी ॥ १७ ॥ |


अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पण्डितो विगीतः समितिंगमः शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत सर्वान् वेदाननुब्रु-