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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
९८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४
Page 994Permalink
| ९८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| यस्मात् सर्वकामातीतो ह्यत्रायं भवति, 'न कञ्चन कामं कामयते' 'अतिच्छन्दा' इति ह्युक्तम्, तत्प्रक्रियापतितोऽयं शोकशब्दः कामवचन एव भवितुमर्हति । कामश्च कर्महेतुः, वक्ष्यति हि— स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते' इति । अतः सर्वकामातितीर्णत्वाद् युक्तमुक्तम्—'अनन्वागतं पुण्येन' इत्यादि । | क्योंकि इस अवस्थामें पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंसे पार हो जाता है, कारण, 'वह किसी कामको कामना नहीं करता', अतिच्छन्दा है' ऐसा उसके विषयमें कहा गया है, इसलिये उस प्रकरणमें आया हुआ यह 'शोक' शब्द कामका ही वाचक होना चाहिये । काम ही कर्मका कारण है; श्रुति ऐसा कहेगी भी कि 'वह जैसी कामनावाला होता है, वैसे संकल्पवाला होता है, और जैसे संकल्पवाला होता है वैसा कर्म करता है।' अतः समस्त कर्मोंसे अतिक्रान्त होनेके कारण 'वह पुण्यसे असम्बद्ध है' इत्यादि कथन ठीक ही है । |
| हृदयस्य-हृदयमिति पुण्डरीकाकारो मांसपिण्डः, तत्स्थमन्तःकरणं बुद्धिर्हृदयमित्युच्यते; तात्स्थ्यात्, मञ्चक्रोशनवत् । हृदयस्य बुद्धेर्ये शोकाः बुद्धिसंश्रया हि ते, "कामः संकल्पो विचिकित्सेत्यादि सर्वं मन एव" (१ । ५ । ३) | 'हृदयस्य'—हृदय कमलके आकारवाले मांसपिण्डको कहते हैं, उसमें स्थित अन्तःकरण अर्थात् बुद्धि हृदयस्थ होनेके कारण मञ्चके चिल्लानेके^१ समान 'हृदय' कही जाती है । हृदयके अर्थात् बुद्धिके जो शोक हैं; वे बुद्धिके ही आश्रित होते हैं; क्योंकि "काम, संकल्प, विचिकित्सा—ये सब |
१. जिस प्रकार 'मञ्चाः क्रोशन्ति' ( मञ्च चिल्लाते हैं ) इस वाक्यके 'मञ्च' शब्दसे मञ्चस्थ पुरुष ग्रहण किये जाते हैं, उसी प्रकार यहाँ 'हृदय' शब्दसे हृदयस्थ बुद्धि ग्रहण करनी चाहिये ।