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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

३७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

Page 384Permalink
३७८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

शोचन्त्यमेवासां तद्भवति पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान्पापं गच्छति ॥ २० ॥

जल और चन्द्रमासे इसमें दैव प्राणका आवेश हो जाता है। दैव प्राण वही है जो सञ्चार करते और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और न नष्ट ही होता है। वह इस प्रकार जानने-वाला समस्त भूतोंका आत्मा हो जाता है जैसा यह देवता (हिरण्यगर्भ) है, वैसा ही वह हो जाता है। जिस प्रकार समस्त प्राणी इस देवताका पालन करते हैं, उसी प्रकार ऐसी उपासना करनेवालेका समस्त भूत पालन करते हैं। जो कुछ ये प्रजाएँ शोक करती हैं, वह (शोकादिजनित दुःख) उन्हींके साथ रहता है। इसे तो पुण्य ही प्राप्त होता है, क्योंकि देवताओंके पास पाप नहीं जाता ॥ २० ॥

| अद्भ्यश्चैनं चन्द्रममश्च दैवः प्राण आविशति। स वै दैवः प्राणः किंलक्षणः? इत्युच्यते—यः सञ्चरन् प्राणिभेदेषु सञ्चरन्समष्टिव्यष्टि-रूपेण—अथवा सञ्चरन् जङ्गमेषु असञ्चरन्स्थावरेषु, न व्यथते न दुःखनिमित्तेन भयेन युज्यते। अथो अपि न रिष्यति न विनश्यति न हिंसामापद्यते।<br><br>सः—यो यथोक्तमेवं वेत्ति त्र्यन्नात्मदर्शनं सः—सर्वेषां भूतानामात्मा भवति, सर्वेषां भूतानां प्राणो भवति, सर्वेषां भूतानां मनो | जल और चन्द्रमासे इसमें दैव प्राण आविष्ट हो जाता है। वह दैव प्राण किन लक्षणोंवाला है? सो बतलाया जाता है—जो समष्टि और व्यष्टिरूपसे प्राणियोंमें सञ्चार करता हुआ और सञ्चार न करता हुआ अथवा जङ्गमोमें सञ्चार करता हुआ और स्थावरोंमें सञ्चार न करता हुआ, व्यथित यानी दुःख-निमित्तक भयसे युक्त नहीं होता और न रिष—विनाश अर्थात् हिंसाको ही प्राप्त होता है।<br><br>जो इस उपर्युक्त त्र्यन्नात्मदर्शनको जानता है, वह समस्त भूतोंका आत्मा हो जाता है, समस्त भूतोंका प्राण हो जाता है, समस्त भूतोंका मन हो |