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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२८७

Page 1303Permalink

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२८७


स होवाच तथा नस्त्वं गौतम मापराधास्तव च पितामहा यथेयं विद्येतः पूर्वं न कस्मिँश्चन ब्राह्मण उवास तां त्वहं तुभ्यं वक्ष्यामि को हि त्वैवं ब्रुवन्तमर्हति प्रत्याख्यातुमिति ॥ ८ ॥

उस राजाने कहा, 'गौतम ! जिस प्रकार तुम्हारे पितामहोंने हमारे पूर्वजोंका अपराध नहीं माना, उसी प्रकार तुम भी हमारा अपराध न मानना। इससे पूर्व यह विद्या किसी ब्राह्मणके यहाँ नहीं रही। उसे मैं तुम्हारे ही प्रति कहता हूँ। भला, इस प्रकार विनयपूर्वक बोलनेवाले तुमको निषेध करनेमें (विद्या देनेसे इनकार करनेमें) कौन समर्थ हो सकता है?' ॥ ८ ॥


स होवाच राजा पीडितं मत्वा क्षामयंस्तथा नोऽस्मान् प्रति मापराधा अपराधं मा कार्षीरस्मदीयोऽपराधो न ग्रहीतव्य इत्यर्थः तव च पितामहा अस्मत्पितामहेषु यथापराधं न जगृहुस्तथा पितामहानां वृत्तमस्मास्वपि भवता रक्षणीयमित्यर्थः । यथेयं विद्या त्वया प्रार्थिता, इतस्त्वत्संप्रदानात् पूर्वं प्राङ् न कस्मिन्नपि ब्राह्मणे उवासोषितवती तथा त्वमपि जानीषे सर्वदा क्षत्रियपरम्परयेयं विद्यागता;उसे पीडित समझकर उस राजाने क्षमा कराते हुए कहा, 'हमारे प्रति इसी प्रकार अपराध न करें, अर्थात् हमारे अपराधको आप इसी प्रकार ग्रहण न करें, जिस प्रकार कि आपके पितामहोंने हमारे पितामहोंका अपराध ग्रहण नहीं किया था; तात्पर्य यह है कि इस प्रकार आपको भी हमारे प्रति अपने पितामहोंके आचरणकी रक्षा करनी चाहिये। जिस प्रकार तुम्हारे द्वारा प्रार्थित यह विद्या इससे यानी तुम्हें सम्प्रदान करनेसे पूर्व किसी भी ब्राह्मणके यहाँ नहीं रही सो तुम भी जानते ही हो, यह विद्या सर्वदा क्षत्रिय-परम्परासे ही आयी है; यदि हो