बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१३५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १३५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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पहने जो फटा न हो, साफ-सुथरा हो। इसे कोई शूद्रजातीय स्त्री या पुरुष न छुए। वह रजस्वला नारी जब तीन दिन बीतनेपर स्नान कर ले तो उसे धान कूटनेके काममें लगावे ॥ १३ ॥
| अथ यस्य जायामार्तवं विन्देदृ- | ‘अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत्’ इत्यादि ग्रन्थको ‘श्रीर्ह वा |
| तुभावः प्राप्नुयादित्येवमादिग्रन्थः | एषा स्त्रीणां’ इस मन्त्रभागके पहले समझना चाहिये; क्योंकि अर्थबल- |
| श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणामित्यतःपूर्व | से ऐसा ही ठीक जान पड़ता है। जिसकी पत्नीको आर्तव—ऋतु- |
| द्रष्टव्यः सामर्थ्यात् । त्र्यहं कंसेन | भाव (रजोधर्म) प्राप्त हो, उसकी वह पत्नी तीन दिनोंतक काँसेके |
| पिबेदहतवासाश्च स्यात् । नैनां | बर्तनमें न खाय और चौथे दिन स्नान करके ऐसा वस्त्र पहने जो |
| स्नातामस्नातां च वृषलो वृषली वा | फटा न हो, साफ-सुथरा हो। स्नानके बाद और पहले भी उस |
| नोपहन्यान्नोपस्पृशेत् । | ऋतुमती स्त्रीको कोई शूद्रजातीय स्त्री या पुरुष न छुए। |
| त्रिरात्रान्ते त्रिरात्र- | तीन रात बीतनेपर—त्रिरात्र-व्रतकी समाप्ति होनेपर वह आप्ल- |
| व्रतसमाप्तावाप्लुत्य स्नात्वा- | वन-स्नान करनेके पश्चात् जो फटा न हो, ऐसा स्वच्छ वस्त्र पहने, इस |
| हतवासाः स्यादिति व्यवहितेन | प्रकार व्यवधानयुक्त अहतवासा |
| सम्बन्धः । तामाप्लुतां व्रीहीनव- | पदके साथ इस वाक्यका अन्वय है। स्नान करनेके पश्चात् उस स्त्री- |
| घातयेद् व्रीह्यवघाताय तामेव | से धान कुटावे। धान कूटनेके |
| विनियुञ्ज्यात् ॥ १३ ॥ | कार्यमें उसीको लगावे ॥ १३ ॥ |
स य इच्छेत् पुत्रो मे शुक्लो जायेत वेदमनुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १४ ॥