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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

३४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

Page 352Permalink
३४६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| इदं तावद्वाचः स्वरूपमुक्तम् ।<br><br>अथ तस्याः कार्यमुच्यते—एषा वाग्घि यस्मादन्तमभिधेयावसानमभिधेयनिर्णयमायत्तानुगता ।<br><br>एषा पुनः स्वयं नाभिधेयवत्प्रकाश्या अभिधेयप्रकाशिकैव, प्रकाशात्मकत्वात् प्रदीपादिवत् । न हि प्रदीपादिप्रकाशः प्रकाशान्तरेण प्रकाश्यते, तद्वद्वाक्प्रकाशिकैव स्वयं न प्रकाश्येत्यनवस्थां श्रुतिः परिहरति—एषा हि न प्रकाश्या । प्रकाशकत्वमेव वाचः कार्यमित्यर्थः ।<br><br>अथ प्राण उच्यते—प्राणो मुखनासिकासञ्चार्या हृदयवृत्तिःप्रणयनात्प्राणः अपनयनान्मूत्रपुरीषादेरपानोऽधोवृत्तिरानाभिस्थानः; व्यानो व्यायमनकर्मा व्यानः<br><br>(पार्श्व-टिप्पणी : प्राणनिरूपणम्) | ही है। यह तो वाक्‌का स्वरूप बतलाया गया। अब उसका कार्य बतलाया जाता है—क्योंकि यह वाक् अन्त—अभिधेयावसान अर्थात् अभिधेय-निर्णयके आयत्त यानी अनुगत है; किंतु यह अभिधेयके समान स्वयं प्रकाश्य नहीं है, यह तो अभिधेयको प्रकाशित करनेवाली ही है; क्योंकि दीपकादिके समान यह प्रकाशस्वरूपा ही है। दीपकादिका प्रकाश किसी अन्य प्रकाशसे प्रकाशित नहीं होता। अतः उसके ही समान वाक् भी प्रकाशिका ही है, वह स्वयं किसीके द्वारा प्रकाश्य नहीं है—इस प्रकार श्रुति अनवस्था दोषकी निवृत्ति करती है, क्योंकि यह वाक् प्रकाश्य नहीं है। तात्पर्य यह है कि प्रकाशकत्व ही वाक्‌का कार्य है।<br><br>अब प्राणका वर्णन किया जाता है—प्राण-मुख और नासिकामें संचार करनेवाली जो [ वायुकी ] हृदयपर्यन्त वृत्ति है, वह प्रणयन (बहिर्गमन) के कारण प्राण कहलाती है, अपान-मल-मूत्रादिको नीचेकी ओर ले जानेके कारण वायुकी जो नाभिस्थानतक रहनेवाली अधोवृत्ति है, वह अपान है, व्यान—व्यायमन |