बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| ४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| योदशमासो वा, आत्मा शरीरम्। कालावयवानां च संवत्सरः शरीरम्, शरीरं चात्मा "मध्यं ह्येषा- मङ्गानामात्मा" इति श्रुतेः। अश्वस्य मेध्यस्येति सर्वत्रानु- षङ्गार्थं पुनर्वचनम्। | वह उसका आत्मा यानी शरीर है। कालके अवयवोंका संवत्सर ही शरीर है, और "इन सब अङ्गोंका मध्यभाग आत्मा है" इस श्रुतिके अनुसार शरीर ही आत्मा है। 'अश्वस्य मेध्यस्य' इसकी पुनरुक्ति इसका सबके साथ सम्बन्ध प्रदर्शित करनेके लिये है। |
| द्यौः पृष्ठमूर्ध्वत्वसामान्यात्। अन्तरिक्षमुदरं सुषिरत्वसामान्यात्। पृथिवी पाजस्यं पादस्यं पाजस्य- मिति वर्णव्यत्ययेन, पादासन- स्थानमित्यर्थः। दिशश्चतस्रोऽपि पार्श्वे पार्श्वेन दिशां सम्बन्धात्। | ऊर्ध्वत्वमें समानता होनेके कारण द्युलोक उसका पृष्ठभाग है, अवकाश या छिद्ररूपतामें समानता होनेके कारण अन्तरिक्ष उदर है, पृथिवी पाजस्य–पादस्य यानी पैर रखनेका स्थान है। 'पादस्य' के वर्ण (द) का ['व्यत्ययो बहुलम्' (पा०सू० ३।१। ८५) इस सूत्रके अनुसार जकारके रूपमें] व्यत्यय होनेसे 'पाजस्य' हुआ है। चारों दिशाएँ पार्श्वभाग हैं, क्योंकि पार्श्वसे दिशाओंका सम्बन्ध है। |
| पार्श्वयोर्दिशां च सङ्ख्यावैषम्या- दयुक्तमिति चेन्न, सर्वमुखत्वोप- पत्तेरश्वस्य पार्श्वभ्यामेव सर्वदिशां सम्बन्धाददोषः। अवान्तरदिश | [यदि कहो कि ] पार्श्व और दिशाओंकी ¹संख्यामें समानता न होनेके कारण ऐसा कहना उचित नहीं है तो यह ठीक नहीं, क्योंकि अश्वका मुख सभी दिशाओंकी ओर हो सकता है, अतः उसके पार्श्वोंका सभी दिशाओंसे सम्बन्ध होनेके कारण इसमें कोई दोष नहीं है। |
१. क्योंकि दिशाएँ चार हैं और पार्श्व केवल दो होते हैं।