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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

८९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

Page 904Permalink
८९०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी अनुवाद
हुपलब्धपानभोजनाः सामान्यतः पुनः पानभोजनान्तरैः क्षुत्पिपासादिविनिवृत्तिमनुमिन्वन्तस्तादर्थ्येन प्रवर्त्तमानाः ।अप्रामाणिक मान लेगा ] किंतु जिन्होंने जलपान और भोजन किया है, वे लोग फिर भी जलपान और भोजन करनेसे क्षुधा-पिपासादिको निवृत्तिका अनुमान करके उसके लिये प्रवृत्त होते देखे ही जाते हैं।
यदुक्तम्—अयमेव तु देहो दर्शनादिक्रियाकर्तेति, तत् प्रथममेव परिहृतं स्वप्नस्मृत्योर्देहादर्थान्तरभूतो द्रष्टेति ।ऐसा जो कहा कि यही देह दर्शनादि क्रियाका कर्ता है; इसका तो ‘स्वप्न और स्मृतियोंका देहसे भिन्न कोई अन्य द्रष्टा है’ ऐसा कहकर पहले ही परिहार कर दिया गया है।
अनेनैव ज्योतिरान्तरस्य अनात्मत्वमपि प्रत्युक्तम् ।तथा इसीसे [ अर्थात् संघातके द्रष्टृत्वका निराकरण करके ] उस अन्य ज्योतिके अनात्मत्वका भी निषेध कर दिया है
यत् पुनः खद्योतादेः कादाचित्कं प्रकाशाप्रकाशकत्वम्, तदसत्, पक्षाद्यवयवसंकोचविकाशनिमित्तत्वात् प्रकाशाप्रकाशकत्वस्य ।तथा खद्योतका जो कभी प्रकाशकत्व और कभी अप्रकाशकत्व बतलाया, वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि वे प्रकाशकत्व और अप्रकाशकत्व तो पंख आदि अवयवोंके सिकोड़ने और खोलनेके कारण हैं
यत् पुनरुक्तम्, धर्माधर्मयोरवश्यं फलदातृत्वं स्वभावोऽभ्युपगन्तव्य इति—तदभ्युपगमे भवतः सिद्धान्तहानात् ।तथा यह जो कहा कि ‘अवश्य फल देना’—यह धर्म और अधर्मका स्वभाव ही स्वीकार कर लेना चाहिये; सो ऐसा स्वीकार करनेपर तुम्हारे ही सिद्धान्तकी हानि होगी।
एतेनानवस्थादोषः प्रत्युक्तः। तस्मा-और इसीसे (सिद्धान्तमें विरोध होनेके ही कारण ) तुम्हारे द्वारा आशङ्कित अनवस्था-दोषका भी निराकरण कर दिया गया। अतः