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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१२५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६

१२५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६


| विषयाणां च। मनआश्रिता हि विषया आत्मनो भोग्यत्वं प्रतिपद्यन्ते; मनःसंकल्पवशानि चेन्द्रियाणि प्रवर्तन्ते निवर्तन्ते च; अतो मन आयतनमिन्द्रियाणाम्। अतो दर्शनानुरूपेण फलमायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥ ५ ॥ | और विषयोंका आश्रय है। मनके आश्रित रहकर ही विषय आत्माके भोग्यत्वको प्राप्त होते हैं। मनके संकल्पके अधीन ही इन्द्रियाँ [ अपने अपने विषयोंमें] प्रवृत्त और [उनसे] निवृत्त होती हैं; अतः मन इन्द्रियोंका आयतन है। इसलिये जो ऐसी उपासना करता है, उसे इस दृष्टिके अनुरूप ही यह फल मिलता है कि वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है ॥ ५ ॥ |

प्रजातिदृष्टिसे रेतस्की उपासना

यो ह वै प्रजातिं वेद प्रजायते ह प्रजया पशुभी रेतो वै प्रजातिः प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥

जो भी प्रजापतिको जानता है वह प्रजा और पशुओंद्वारा प्रजात-(वृद्धिको प्राप्त) होता है। रेतस् ही प्रजापति है। जो ऐसा जानता है, वह प्रजा और पशुओंद्वारा प्रजात होता है ॥ ६ ॥

| यो ह वै प्रजातिं वेद प्रजायते ह प्रजया पशुभिश्च संपन्नो भवति।<br><br>रेतो वै प्रजातिः। रेतसा प्रजननेन्द्रियमुपलक्ष्यते। तद्विज्ञानानुरूपं फलं प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥ | जो प्रजातिको जानता है, वह प्रजात होता अर्थात् प्रजा और पशुओंद्वारा सम्पन्न होता है। वीर्य ही प्रजाति है। 'रेतस्' शब्दसे प्रजननेन्द्रिय उपलक्षित होती है। जो ऐसी उपासना करता है, उसे उसकी दृष्टिके अनुरूप यह फल मिलता है कि वह प्रजा और पशुओंसे प्रजात (सम्पन्न) होता है ॥ ६ ॥ |