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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१३०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१३०४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

| न्त्यादिपदार्थषट्कनिर्णये दिवमेवाहवनीयं कुर्वति इत्यादि । इहाप्यमुष्य लोकस्याग्नित्वमादित्यस्य च समिच्चमित्यादि बहुसाम्यम् । तस्मात्तच्छेषमेवैतद्दर्शनमिति । | आदि छः पदार्थोंका निर्णय करते हुए 'द्युलोकको ही आहवनीय करते हैं' इत्यादि कहा गया है। यहाँ भी उस द्युलोकका अग्नित्व और आदित्यका समित्त्व इत्यादि उससे बहुत कुछ साम्य है; अतः यह विद्या उस अग्निहोत्राहुतिदर्शनका ही शेष है। |
| न, यतिथ्यामिति प्रश्नप्रतिवचनपरिग्रहात् । यतिथ्यामित्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनस्य यावदेव परिग्रहस्तावदेवैवं शब्देन पराम्रष्टुं युक्तम्; अन्यथा प्रश्नानर्थक्यान्निर्ज्ञातत्वाच्च संख्याया अग्नय एव वक्तव्याः । | समाधान—नहीं, क्योंकि इस ('एवं'शब्द) से 'यतिथ्याम्' इत्यादि प्रश्न और उसका उत्तर ग्रहण किये गये हैं। 'यतिथ्याम्' इत्यादि प्रश्न और उत्तरका जितना भी परिग्रह है, उतना ही 'एवम्' शब्दसे परामर्श करना उचित है, नहीं तो यह प्रश्न व्यर्थ हो जायगा; तथा अग्निहोत्र-सम्बन्धी पदार्थोंकी संख्या तो अच्छी तरहसे ज्ञात ही है, इसलिये अग्नियोंका ही निर्देश करना उचित है। |
| अथ निर्ज्ञातमप्यनूद्यते । | शङ्का—अच्छी तरहसे ज्ञात विषयका भी तो अनुवाद किया जाता है। |
| यथाप्राप्तस्यैवानुवदनं युक्तं न त्वसौ लोकोऽग्निरिति । | समाधान—अनुवाद तो जो पदार्थ जैसा प्राप्त है, उसका उसी प्रकार करना उचित होता है, ऐसा नहीं कि वह द्युलोक अग्नि है।¹ |


१. क्योंकि वास्तवमें तो द्युलोक अग्नि है नहीं; इसलिये यह अग्निके स्वरूप-का अनुवाद नहीं हो सकता। यहाँ तो द्युलोकमें अग्निदृष्टि ही विवक्षित है।