वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २४९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २४९
प्रशस्तपादभाष्यम्
शेषाणामाश्रयव्यापित्वम् ।
अपाकजरूपरसगन्धस्पर्शपरिमाणैकपृथक्त्वसांसिद्धिकद्रवत्वगुरुत्वस्नेहानां यावद्-
द्रव्यभावित्वम् ।
शेषाणामयावद्द्रव्यभावित्वञ्चेति ।
अवशिष्ट सभी गुण अपने आश्रय के सभी अंशों में रहते हैं ।
अपाकज रूप, अपाकज रस, अपाकज गन्ध, अपाकज स्पर्श, परिमाण,
एकत्व, एकपृथक्त्व, सांसिद्धिक द्रवत्व, गुरुत्व और स्नेह इन दश गुणों
का 'यावद्द्रव्यभावित्व' साधर्म्य है ।
'शेष' अर्थात् कथित अपाकज रूपादि से भिन्न सभी गुणों का 'अया-
वद्द्रव्यभावित्व' साधर्म्य है ।
न्यायकन्दली
शेषाणामाश्रयव्यापित्वम् । उक्तेभ्यो येऽन्ये ते शेषाः । तेषामाश्रयव्यापित्वं संयोगा-
दिवदव्यापकं न भवतीत्यर्थः ।
अपाकजरूपादीनां यावद्द्रव्यभावित्वम् । यावदाश्रयद्रव्यं तावद्रूपादयो विद्यन्ते ।
पाकजरूपादयः सत्येवाश्रये नश्यन्तीत्यपाकजग्रहणम् ।
शेषाणामयावद्द्रव्यभावित्वम् । अपाकजरूपादिव्यतिरिक्ता गुणा यावद्द्रव्यं न सन्ति,
सत्येवाश्रये नश्यन्तीत्यर्थः ।
शेष सभी गुणों का 'आश्रयव्यापित्व' साधर्म्य है । ऊपर जितने भी गुण कहे
गये हैं, उनसे भिन्न सभी गुण यहाँ 'शेष' शब्द से अभिप्रेत हैं । उन सबों का 'आश्रय-
व्यापित्व' (साधर्म्य है), अर्थात् वे संयोगादि गुणों की तरह अव्याप्यवृत्ति नहीं हैं ।
कथित अपाकज रूपादि गुणों का 'यावद्द्रव्यभावित्व' (साधर्म्य है), अर्थात्
जब तक आश्रयरूप द्रव्य रहते हैं, तब तक ये अपाकज रूपादि रहते हैं । इसमें
'अपाकज' पद का उपादान इसलिए किया गया है कि पाकज रूपादि आश्रय के
रहते हुए ही नष्ट हो जाते हैं ।
'शेष' गुणों का 'अयावद्द्रव्यभावित्व' साधर्म्य है । अर्थात् उक्त अपाकज
रूपादि से भिन्न जितने भी गुण हैं, वे तब तक नहीं रहते, जब तक उनके आश्रय
द्रव्य रहते हैं, किन्तु उनके रहते ही नष्ट हो जाते हैं ।
अब प्रत्येक गुण का असाधारण धर्म कहना है, अतः 'रूपादीनाम्' इत्यादि वाक्य
लिखते हैं । 'रूपमादिर्येषाम्' इस व्युत्पत्ति से सिद्ध 'रूपादि' शब्द से युक्त प्रकृत
२५० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे रूपादि-
प्रशस्तपादभाष्यम्
रूपादीनां सर्वेषां गुणानां प्रत्येकम्परसामान्यसम्बन्धाद्रूपादिसंज्ञा
भवन्ति ।
रूपादि सभी गुणों के रूपादि नाम इसलिए हैं कि उनमें (रूपत्वादि)
अपर जातियों का सम्बन्ध है ।
न्यायकन्दली
सम्प्रति प्रत्येकं गुणानां परस्परवैधर्म्यप्रतिपादनार्थमाह-रूपादीनामिति । रूपमादिर्येषां
तेषामेकैकं प्रत्यपरजाते रूपत्वादिकायाः सम्बन्धाद्रूपादिसंज्ञा रूपमिति रस इति संज्ञा
भवन्ति । रूपत्वाद्यपरसामान्यकृता रूपादिसंज्ञा रूपादीनां प्रत्येकं वैधर्म्यम् । रूपत्वसामान्यं
नास्तीति केचित्, तदयुक्तम्, नीलपीतादिभेदेषु रूपं रूपमिति प्रत्ययानुवृत्तेः । चक्षुर्ग्राह्य-
तोपाधिकृता तदनुवृत्तिरिति चेत्, न, तेषां रूपमित्येवं चक्षुषाऽग्रहणात् । तद्ग्राह्यतानिमित्तत्वे
हि ग्रहणानन्तरं तथा प्रत्ययः स्यात् । चक्षुर्ग्राह्यता तद्ग्रहणयोग्यता, सा च नीलादिषु
त्रिकालावस्थायिनीति चेत् ? अस्तु कामम्, किन्त्वेषा यदि प्रतिरूपं व्यावृत्ता,
प्रत्ययानुगमो न स्यात्, एकनिमित्ताभावात् । अथानुवृत्ता, संज्ञाभेदमात्रम् । एवं
रसादयोऽपि व्याख्याताः ।
वाक्य का अर्थ है कि रूपादि गुणों में से प्रत्येक में रूपत्वादि स्वरूप अपर जातियों
के सम्बन्ध से रूप, रस आदि संज्ञायें होती हैं । रूपादि नाम ही रूपादि गुणों के
असाधारण धर्म हैं, जिनकी मूल हैं रूपत्वादि जातियाँ । कोई कहते हैं कि (प्र.)
रूपत्व नाम की कोई जाति नहीं है । (उ.) किन्तु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि
नीलपीतादि विभिन्न रूपों में 'यह रूप है' इस एक प्रकार की (अनुवृत्ति) प्रतीति
होती है । ( प्र.) सभी रूप आँख से देखे जाते हैं, इसी से सभी रूपों में एक
आकार की प्रतीति होती है । (उ.) नीलपीतादि में 'यह रूप है' इस आकार की
प्रतीति आँख से नहीं होती है, अगर चक्षु से गृहीत होने के कारण ही नीलादि में
'यह रूप है' इस प्रकार की प्रतीति हो, तो फिर चक्षु के द्वारा ग्रहण के बाद ही
'यह रूप है' इस प्रकार की प्रतीति होनी चाहिए । (प्र.) 'चक्षुर्ग्राह्यत्व' (चक्षु से
गृहीत होने ) का अर्थ है-चक्षु के द्वारा गृहीत होने की स्वरूपयोग्यता, यह तो
नीलादि में तीनों कालों में है ही । (उ.) मान लिया कि है; किन्तु यह योग्यता
नीलादि प्रत्येक रूप से अगर अलग-अलग है तो फिर 'सभी रूपों में ये रूप है'
इस एक आकार की प्रतीति नहीं होगी; क्योंकि उसका कोई एक कारण नहीं है ।
अगर चक्षुर्ग्राह्यता सभी रूपों में एक है, तो फिर जाति को मान लेने में कोई
विवाद ही नहीं रह जाता है । इसी प्रकार से रसादि की भी व्याख्या हो जाती है ।