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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् २०९

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् २०९
प्रशस्तपादभाष्यम्
प्रयत्नान्ताः सिद्धाः । धर्म्माधर्म्मावात्मान्तरगुणानामकारणत्यवचनात् ।
संस्कारः, स्मृत्युत्पत्तौ कारणवचनात् । व्यवस्थावचनात् सङ्ख्या ।
छः गुण आत्मा में कहे गये हैं। यतः "आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरेऽकारण-
त्वात्' (६।१।१५) इस सूत्र के द्वारा एक आत्मा के गुणों को दूसरी
आत्मा के गुणों का अकारण कहा गया है, इससे सिद्ध होता है कि धर्म
और अधर्म ये दोनों भी आत्मा के गुण हैं । महर्षि ने "आत्ममनसोः
संयोगविशेषात्संस्काराच्च स्मृतिः" (९।२।६) इस सूत्र के द्वारा संस्कार
को स्मृति का कारण कहा है, अतः आत्मा में संस्कार नामक गुण का
रहना भी उनको अभिप्रेत समझना चाहिए । "व्यवस्थातो नाना"
(३।२।२०) सूत्रकार की इस उक्ति से आत्मा में संख्या की सिद्धि समझनी
न्यायकन्दली
"आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरगुणेष्वकारणत्वात्" इति। अस्यायमर्थः - आत्मान्तरगुणानां
सुखादीनामात्मान्तरगुणेषु सुखादिषु कारणत्वाभावाद्धर्म्माधर्म्मयोरन्यत्र वर्त्तमानयोरन्यत्रारम्भ-
कत्वमयुक्तमिति। एतेन धर्म्माधर्म्मयोरात्मगुणत्वं कथितम्, अन्यथा तयोः सुखादिसाधर्म्यकथ-
नेनानारम्भकत्वसमर्थनं न स्यात् । संस्कारः स्मृत्युत्पत्ताविति । आत्ममनसोः संयोगात्संस्कारा-
च्चेति स्मृतिसूत्रं लक्षयति । पूर्वानुभूतोऽर्थः स्मर्य्यते, न तत्रानुभवः कारणम्, चिरविनष्टत्वात्,
नाप्यनुभवाभावः कारणमभावस्य निरतिशयत्वेन पटुमन्दादिभेदानुपपत्तेरभ्यासवैयर्थ्याच्च ।
दूसरी आत्मा में सुख का उत्पादन नहीं कर सकता है, वैसे ही एक आत्मा का धर्म
या अधर्म दूसरी आत्मा में धर्म या अधर्म को भी उत्पन्न नहीं कर सकता । इससे
यह कथित हो जाता है कि 'धर्म और अधर्म आत्मा के गुण हैं' । अगर ये
आत्मा के गुण न हों तो फिर जैसे एक आत्मा में रहनेवाले सुखादि दूसरी
आत्मा में सुखादि के उत्पादक नहीं हैं, वैसे ही धर्म और अधर्म भी, तथा एक
आत्मा में रहनेवाले सुखादि भी, इस सादृश्य से दूसरी आत्मा में अधर्मादि के
उत्पन्न न होने का समर्थन असङ्गत हो जायगा । महर्षि कणाद ने संस्कार
को स्मृति का कारण कहा है, अतः आत्मा में संस्कार (भावना नाम का)
गुण भी समझना चाहिए । 'संस्कारः' इत्यादि भाष्य की पंक्ति "आत्ममनसोः
संयोगात्संस्काराच्च स्मृतिः" (९/२/६) इस सूत्र की ओर सङ्केत करती
है । पूर्वकाल में अनुभूत विषय की ही स्मृति होती है । स्मृति के प्रति
पूर्वानुभव कारण नहीं हो सकता है; क्योंकि स्मृति की उत्पत्ति से बहुत पहले
वह नष्ट हो जाता है । उस अनुभव का नाश भी उसका कारण नहीं
हो सकता है; क्योंकि अभाव में अर्थात् अनुभवनाशजनित अनुभव की असत्ता
रूप अभाव में और अनुभव की अनुत्पत्तिमूलक अनुभव की असत्ता रूप

२१० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-
न्यायकन्दली
तस्मादनुभवेनात्मनि कश्चिदतिशयः कृतो यतः स्मरणं स्यादिति संस्कारकल्पना । ये तु
विनष्टमप्यनुभवमेव स्मृतेः कारणमाहुः, तेषां विनष्टमेव ज्योतिष्टोमादिकं स्वर्गादिफलस्य
साधनं भविष्यतीत्यदृष्टस्याप्युच्छेदः स्यात् । व्यवस्थावचनात् संख्येति । "नानात्मानो
व्यवस्थातः" इति सूत्रेणात्मनानात्वप्रतिपादनाद् बहुत्वसंख्या सिद्धेत्यर्थः ।
अथ केयं व्यवस्था ? नानाभेदभाविनां ज्ञानसुखादीनामप्रतिसन्धानम्, ऐकात्म्ये हि
यथा बाल्यावस्थायामनुभूतं वृद्धावस्थायामनुसन्धीयते मम सुखमासीन्मम दुःखमासीदिति,
एवं देहान्तरानुभूतमप्यनुसन्धीयते, अनुभवितुरेकत्वात् । न चैवमस्ति, अतः प्रतिशरीरं
नानात्मानः । यथा सर्वत्रैकस्याकाशस्य श्रोत्रत्वे कर्णशष्कुल्याद्युपाधिभेदाच्छब्दोपलब्धिव्यवस्था,
अभाव में कोई भी अन्तर नहीं है, अतः अधिक काल तक स्मरण रखने से 'पटु'
और थोड़े समय तक स्मरण रखने से मन्द, इस प्रकार की दोनों स्मृतियों में कोई
अन्तर नहीं रहेगा । एवं चिरकाल तक स्मरण रखने के लिए अभ्यास की भी
जरूरत नहीं रह जायगी, अतः संस्कार रूप अतिशय की कल्पना की जाती है ।
जो कोई विनष्ट अनुभव को ही स्मृति का कारण मानते हैं, उनके मत में विनष्ट
ज्योतिष्टोमादि याग से ही स्वर्गादि की उत्पत्ति माननी पड़ेगी । अतः उनके मत में
धर्म और अधर्म इन दोनों को भी मानने की आवश्यकता नहीं रहेगी । 'व्यवस्था
के रहने से संख्या भी' अर्थात् "व्यवस्थातो नाना" (३।२।२०) इस सूत्र से आत्मा
में नानात्व की सिद्धि की गयी है । इससे आत्मा में बहुत्व संख्या की भी सिद्धि
होती है ।
(प्र.) (आत्मा अनेक हैं) इसमें क्या युक्ति है ? (उ.) यही कि एक के
ज्ञान-सुखादि का दूसरे को स्मरण नहीं होता है । अर्थात् आत्मा अगर एक माना
जाय तो फिर बाल्यावस्था के विषय का जैसे वृद्धावस्था में स्मरण होता है कि
'मुझे दुःख था, मुझे सुख था' वैसे ही और देहों के द्वारा अनुभूत विषयों का
स्मरण भी हो; क्योंकि अनुभव करने वाला आत्मा सभी देहों में एक ही है; किन्तु
ऐसा नहीं होता । अतः प्रत्येक शरीर में रहनेवाले आत्मा भिन्न-भिन्न हैं । (प्र.)
जैसे यह नियम है कि आकाश के एक होने पर भी कर्णशष्कुली रूप उपाधि
से युक्त आकाश से ही शब्द सुना जाता है, वैसे ही आत्मा के एक होने पर
भी जिस देह रूप उपाधि से युक्त होकर वह (आत्मा) जिन सुखादि का
अनुभव करता है, उस देह रूप उपाधि से युक्त आत्मा ही उन सुखादि
का स्मरण भी करेगा दूसरा नहीं, यह व्यवस्था भी की जा सकती है । (इसके