वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७०५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७०५
प्रशस्तपादभाष्यम्
रस्तीति । न, जातिसङ्करप्रसङ्गात् । निष्क्रमणादीनां जातिभेदात्
प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तौ जातिसङ्करः प्रसज्यते । कथम् ? द्वयोर्द्रष्ट्रो-
रेकस्मादपवरकादपवरकान्तरं गच्छतो युगपन्निष्क्रमणप्रवेशनप्रत्ययौ
उत्क्षेपणत्वादि की तरह निष्क्रमणत्वादि जातियाँ मानी जायें तो इसमें
साङ्कर्य दोष होगा । (विशदार्थ यह है कि) निष्क्रमणादि क्रियाओं में यदि
विभिन्न जातियों के कारण अनुवृत्ति की प्रतीति और व्यावृत्ति की
प्रतीति मानें तो इसमें साङ्कर्य दोष होगा । (प्र.) किस प्रकार ? (साङ्कर्य
दोष होगा ?) (उ.) दो द्वारों को पार करते हुए किसी एक
व्यक्ति के एक ही गमन कर्म को देखनेवाले दो पुरुषों में से एक को
एक ही समय उसी गमन कर्म में निष्क्रमण की प्रतीति और
दूसरे को प्रवेशन की प्रतीति होती है । जैसे कि एक ही द्वार में जाते
न्यायाकन्दली
एकस्यां व्यक्तौ विरुद्धानेकजातिसमवायः प्रसज्यत इत्यर्थः ।
कथमिति पृष्टः सत्राह-द्वयोर्द्रष्ट्रोरिति । द्वयोर्द्रष्ट्रोरेकस्मादपवरकादपवर-
कान्तरं गच्छतः पुरुषस्य यौ द्रष्टारौ तयोरेकस्यां व्यक्तौ निष्क्रमणप्रवेशनप्रत्ययौ
दृष्टौ । यतोऽपवरकात् पुरुषो निर्गच्छति तत्र स्थितस्य निर्गच्छतीति प्रत्ययः,
मानकर कार्यभेदमूलक मानें, तो फिर विभिन्न उत्क्षेपणादिविषयक प्रतीतियों की
उपपत्ति भी उन प्रतीतियों को कार्यभेदमूलक मानकर की जा सकती है ।
'न' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उक्त आक्षेप का समाधान करते हैं ।
अभिप्राय यह है कि (उत्क्षेपणत्वादि की तरह यदि) निष्क्रमणत्वादि जातियाँ भी
मानी जायें तो 'जातिसङ्करप्रसङ्ग' होगा, अर्थात् एक ही व्यक्ति में विरुद्ध अनेक
जातियों का समवाय मानना पड़ेगा । 'कथम्' इस पद के द्वारा पूछे जाने पर
(अर्थात् यह साङ्कर्य क्यों कर होगा ?) 'द्वयोर्द्रष्ट्रोः' इस सन्दर्भ के द्वारा उक्त
साङ्कर्य दोष को उपपादन करते हैं । 'द्वयोर्द्रष्ट्रोः' अर्थात् एक प्रकोष्ठ से दूसरे
प्रकोष्ठ में जाते हुए पुरुष को जो दो देखनेवाले पुरुष हैं, उन दोनों में से एक
पुरुष को उक्त गमनरूप क्रिया में 'निष्क्रमणत्व' की और दूसरे पुरुष को
'प्रवेशनत्व' की प्रतीति होती है । इस प्रकार एक ही क्रिया में दोनों की प्रतीति
होती है, अर्थात् जिस प्रकोष्ठ से वह पुरुष जाता है, उस प्रकोष्ठ में रहनेवाले
पुरुष को उससे जानेवाले पुरुष में 'निष्क्रामति' इस आकार की प्रतीति
होती है एवं जिस प्रकोष्ठ में वह पुरुष जाता है, उस प्रकोष्ठ में रहनेवाले को
७०६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [कर्मनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
दृष्टौ, तथा द्वारप्रदेशे प्रविशति निष्क्रामतीति च । यदा तु प्रतिसीराद्य-
पनीतं भवति, तदा न प्रवेशनप्रत्ययो नापि निष्क्रमणप्रत्ययः; किन्तु
गमनप्रत्यय एव भवति । तथा नालिकायां वंशपत्रादौ पतति बहूनां
द्रष्टॄणां युगपद् भ्रमणपतनप्रवेशनप्रत्यया दृष्टा इति जातिसङ्कर-
हुए एक ही व्यक्ति में (विरुद्ध दिशाओं में खड़े हुए दो व्यक्तियों को) क्रमशः
'यह प्रवेश करता है' एवं 'यह निकलता है' इन दोनों प्रकार की
प्रतीतियाँ होती हैं, (जब जाते हुए व्यक्ति के बीच की) प्रतिसीरा (पर्दा)
उठा दी जाती है, तब उन्हीं दोनों व्यक्तियों को न निष्क्रमण की प्रतीति
होती है और न प्रवेशन की प्रतीति, केवल गमन की ही प्रतीति होती है ।
इसी प्रकार बहती हुई नाली में जब बाँस प्रभृति के पत्ते गिरते हैं, तब उन
पत्तों में एक ही समय बहुत से देखनेवालों में से किसी को भ्रमण की प्रतीति
होती है और किसी को प्रवेशन की प्रतीति होती है। अतः निष्क्रमणत्वादि
जातियों के मानने पर जातिसङ्कर दोष होगा । उत्क्षेपणादि क्रियाओं में इस
प्रकार का साङ्कर्य नहीं देखा जाता । अतः उत्क्षेपणादि क्रियाओं में अनुवृत्ति
की प्रतीति और व्यावृत्ति की प्रतीति उत्क्षेपणात्वादि जातियों के भेद से होती
है; किन्तु निष्क्रमणादि क्रियाओं में उक्त दोनों प्रतीतियाँ कार्यों की विभिन्नता
न्यायकन्दली
यत्र प्रविशति तत्र स्थितस्य प्रविशतीति प्रत्ययः । यदि जातिकृताविमौ प्रत्ययौ दृष्टौ तदैकस्यां
व्यक्तौ परस्परविरुद्धनिष्क्रमणत्वप्रवेशनत्वजातिद्वयसमावेशो दूषणं स्यात् । तथा द्वारप्रदेशे
प्रविशति निष्क्रामतीति यथैकस्मिन्नेव बहुप्रकोष्ठके गृहे प्रकोष्ठात् प्रकोष्ठान्तरं गच्छति पुरुषे
पूर्व्वापरप्रकोष्ठस्थितयोर्द्रष्ट्रोर्द्वारप्रदेशे निर्गच्छति प्रविशतीति प्रत्ययौ भवतः। यदा तु प्रतिसीराद्य-
पनीतं मध्यस्थितं जवनिकापनीतं भवति तदा न प्रवेशनप्रत्ययो नापि निष्क्रमणप्रत्ययः,
उसी पुरुष में 'प्रविशति' यह प्रतीति होती है । यदि निष्क्रमण और प्रवेशन
क्रियाओं की प्रतीतियाँ निष्क्रमणत्वादि जातिमूलक हों, तो फिर एक ही व्यक्ति में
परस्पर विरुद्ध निष्क्रमणत्व और प्रवेशनत्वादि जातियों के समावेशरूप साङ्कर्य दोष
की आपत्ति होगी । 'तथा द्वारदेशे प्रविशति निष्क्रामतीति' उक्त भाष्य सन्दर्भ का
यह अभिप्राय है कि जैसे बहुत-सी कोठरियों वाले भवन में यदि एक
पुरुष एक कोठरी में जाता है, तो जिस कोठरी से वह जाता है उस कोठरी
में रहनेवाले दूसरे पुरुष को उस जानेवाले पुरुष में 'यह निकलता है' इस प्रकार
की प्रतीति होती है और जिस कोठरी में वह जाता है, उस कोठरी में
रहनेवाले दूसरे पुरुष को उसी पुरुष में 'यह आता है' इस प्रकार की प्रतीति
होती है । 'यदा तु प्रतिसीराद्यपनीतम्' अर्थात् जब बीच का पर्दा (या
दीवाल जिससे कोठरियाँ बनती हैं) हटा दिया जाता है, उस समय उसी पुरुष में
न 'निकलने' की और न 'आने' की प्रतीति होती है, केवल 'चलने' की ही
प्रतीति होती है । अतः वह 'गमन' रूप क्रिया ही है, उसी में उपाधि भेद से