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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७२९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७२९
प्रशस्तपादभाष्यम्
स्रोतोभूतानामपां स्थलात्रिम्नाभिसर्पणं यत् तद्
द्रवत्वात् स्यन्दनम् । कथम् ? समन्ताद् रोधःसंयोगेनावयविद्रवत्वं प्रति-
बद्धम्, अवयवद्रवत्वमप्येकार्थसमवेतं तेनैव प्रतिबद्धम्, उत्तरोत्तरावयवद्रव-
त्यानि संयुक्तसंयोगैः प्रतिबद्धानि । यदा तु मात्रया सेतुभेदः
धारारूपी जल का अपने आश्रयरूप स्थल से नीचे की ओर फैलना
ही 'स्यन्दन' नाम की क्रिया है, जो द्रवत्व से उत्पन्न होती है । (प्र.) किस
प्रकार ? (उ.) नदी के जल किनारों के सभी अवयवों के साथ पूर्ण रूप
से संयुक्त रहने के कारण अवयवी (रूप जल) का द्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाता
है । उस अवयवी के सभी अवयवों के द्रवत्व भी उस अवयवी में एकार्थ-
समवाय सम्बन्ध से रहने के कारण किनारों के उसी संयोग से प्रतिरुद्ध
रहते हैं । उन अवयवों के आगे-आगे के अवयवों के द्रवत्व भी उक्त संयुक्त-
संयोगों से प्रतिरुद्ध रहते हैं । जब थोड़ा-सा भी बाँध काट दिया
न्यायकन्दली
वेगाभावात् पतनं गुरुत्वात् । तत्राद्यं कर्म गुरुत्वात्, द्वितीयादीनि तु गुरुत्व-
संस्काराभ्याम् । तेषु मुसलादिष्वाद्यं कर्म गुरुत्वाद् भवति तेन कर्मणा संस्कारः क्रियते,
तदनन्तरमुत्तरकर्माणि गुरुत्वसंस्काराभ्यां जायन्ते, द्वयोरपि प्रत्येकमन्यत्र सामर्थ्याव-
धारणात् ।
द्रवत्वस्य कारणत्वं कथयति-स्रोतोभूतानामपां स्थलात्रिम्नाभिसर्पणं
यत् तद् द्रवत्वात् स्यन्दनम् । अपां यत्र स्थलात्रिम्नाभिसर्पणं तत् स्यन्दनं द्रवत्या-
दुपजायत इत्यर्थः । कथमिति प्रश्नः । समन्तादित्युत्तरम् ।
न रहने पर बीच में ही जो पतन हो जाता है, उसका कारण भी गुरुत्व ही
है । इनमें पहला कर्म गुरुत्व से उत्पन्न होता है और बाद के कर्म गुरुत्व और
वेगाख्य संस्कार इन दोनों से उत्पन्न होते हैं । इनमें मूसल की पहली क्रिया उसके
गुरुत्व से उत्पन्न होती है । उस क्रिया से मूसल में वेग उत्पन्न होता है । इसके बाद
की मूसल की क्रियायें गुरुत्व और वेग इन दोनों से ही होती है; क्योंकि इन दोनों
में से प्रत्येक में क्रिया को उत्पन्न करने का सामर्थ्य अन्यत्र निश्चित हो चुका है ।
'स्रोतोभूतानामपाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा द्रवत्व से स्यन्दनरूप क्रिया की उत्पत्ति
की रीति कही गयी है । किसी ऊँची जगह से जल जो नीचे की ओर फैलता है, उसे
'स्यन्दन' कहते हैं, यह स्यन्दनरूप क्रिया द्रवत्व से उत्पन्न होती है । 'कथम्' यह पद
प्रश्न का बोधक है और 'समन्तात्' इत्यादि से इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है ।

७३० न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
कृतो भवति, तदा समन्तात् प्रतिबद्धत्यादवयविद्रवत्वस्य कार्या-
रम्भो नास्ति । सेतुसमीपस्थस्यावयवद्रवत्वस्योत्तरेषामवयव-
द्रवत्यानां प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभः । ततः क्रमशः संयुक्ताना-
जाता है, उस समय सभी किनारों के साथ संयुक्त रहने के कारण अवयवी
के द्रवत्व प्रतिरुद्ध रहते हैं, अतः अपना (स्यन्दन) क्रियारूप काम नहीं
कर सकते । अतः कोई प्रतिबन्ध न रहने के कारण बाँध के समीप में
रहनेवाले जलावयवों के द्रवत्व ही अपने कार्य करने को उन्मुख रहते हैं ।
उसके बाद बाँध से संयुक्त जलावयवों में ही 'अपसर्पण' (नीचे की तरफ
फैलने की) क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । इसके बाद पहले द्रव्य का
न्यायकन्दली
समन्तात् सर्वतो रोधःसंयोगे कूलसंयोगे सति अवयविनो द्रवत्वं प्रतिबद्धं स्यन्दनं वा न
करोति । अवयवद्रवत्वमप्येकार्थसमवेतं तेनैव प्रतिबद्धम्, यस्मिन्नवयवे साक्षाद्
रोधःसंयोगोऽस्ति तदवयवगतद्रवत्वं तेनैव रोधःसंयोगेन प्रतिबद्धम्, उत्तरोत्तराणि
त्ववयवद्रवत्वानि संयुक्तसंयोगैः प्रतिबद्धानि, रोधःसंयुक्तेनावयवेन सह संयोगादय-
म्वान्तरस्य द्रवत्वं प्रतिबद्धमिति । तत्संयोगादपरस्य प्रतिबद्धमित्यनेनैव न्यायेनोत्तरोत्तर-
द्रवत्वानि प्रतिबद्धानि । यदा तु मात्रया सेतुभेदः कृतो भवति, तदा समन्तात्
प्रतिबद्धस्यावयविद्रवत्वस्य कार्यारम्भो नास्ति, दीर्घतरेण सेतुना समन्तात् प्रतिबद्ध-
स्यावयविनो महापरिमाणस्यैकदेशकृतेनाल्पीयसा मार्गेण निर्गमाभावात् । सेतुसमीपस्थस्य
'समन्तात्' अर्थात् सभी कूल के अवयवों में 'रोधःसंयोगेन' दोनों किनारे के साथ
जल का संयोग उसके द्रवत्व को प्रतिरुद्ध कर देता है । 'अवयवद्रवत्वमप्येकार्थ-
समवेतं तेनैव प्रतिबद्धम्' जिस अवयव का किनारे के साथ साक्षात् संयोग है, उस
अवयव में रहनेवाला द्रवत्व भी अवयव और किनारे के संयोग से ही प्रतिरुद्ध हो
जाता है । 'उत्तरोत्तराणि त्ववयवद्रवत्वानि संयुक्तसंयोगैः प्रतिबद्धानि' अर्थात्
किनारे से संयुक्त अवयव के साथ संयोग के कारण ही अन्य अवयवों का द्रवत्व
भी प्रतिरुद्ध होता है । उस अन्य अवयव के संयोग से तीसरे अवयव का
द्रवत्व प्रतिरुद्ध होता है । इसी रीति से अन्य अवयवों के द्रवत्व भी प्रतिरुद्ध होते
हैं । 'यदा मात्रया सेतुभेदः कृतो भवति तदा समन्तात् प्रतिबद्धस्यावयविद्रवत्वस्य
कार्या- रम्भो नास्ति' क्योंकि बहुत बड़े बाँध से घिरे हुए उस महत् परिमाणवाले
अवयवी रूप जल का किसी एक ओर बनाये गये छोटे मार्ग से निकलना सम्भव
नहीं है; किन्तु उस बाँध के समीप में जो थोड़े से जल के अवयव हैं, उनका
उस छोटे से मार्ग से निकलना सम्भव है । इस प्रकार जल के कुछ अवयवों