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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५३
न्यायकन्दली
नवयवमेकं विस्पष्टमर्थतत्त्वमनुभूयते । यदि हि वर्णा एव पदम् ? न तदेकबुद्धि-
निर्ग्राह्यमिति अनालम्बना बुद्धिः पर्यवस्यति । 'शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे' इति च व्यपदेशो न
घटते । तस्माद् वर्णव्यतिरिक्तः कोऽपि सम्भवत्येको यस्मादर्थः स्फुटीभवतीति ।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते । गुणरत्नाभरणः कायस्थकुलतिलकः पाण्डुदासइत्यादिषु
पदेषूच्चार्यमाणेषु क्रमभाविनो वर्णाः परं प्रतीयन्ते न त्वन्ते वर्णव्यतिरिक्तस्य कस्यचिदर्थस्य
संवेदनमस्ति । यदि हि तस्य पूर्वं वर्णात्मकतया संविदितस्यान्ते स्वरूपसंवेदनम्, पूर्वज्ञानस्य
मिथ्यात्वमवसीयते रजतज्ञानस्येव शुक्तिकासंवित्तौ । न चैवं प्रतिपत्तिरस्ति 'नायं वर्णः, किन्तु
स्फोटः' इति । या चेयमेकार्थावमर्शिनी बुद्धिः, सापि नार्थान्तरमवभासयति किन्तु वन-
एक सम्पूर्ण और अत्यन्त स्पष्ट अर्थतत्त्व का बोध होता है । यदि वर्णों का
समुदाय ही पद हो (वर्णों का कोई एक स्फोट न हो) तो फिर पद में एकत्व की
प्रतीति न हो सकेगी, अतः 'एकं पदम्' इत्यादि बुद्धियाँ निर्विषयक हो जायेंगी ।
एवं 'शब्दाद् अर्थं प्रतिपद्यामहे' (एक अखण्ड शब्द से अर्थ को हम समझते हैं)
यह व्यवहार न हो सकेगा (किन्तु 'बहुत से शब्दों से हम अर्थ को समझते हैं' इस
प्रकार का व्यवहार होगा) । अतः वर्णों से भिन्न कोई एक वस्तु है, जिससे अर्थ
'प्रस्फुटित' होता है (उसी की अन्वर्थसंज्ञा 'स्फोट' है ) ।
इन सब युक्तियों से स्फोट की सत्ता की सम्भावना उपस्थित होने पर सिद्धान्तियों
का कहना है कि 'गुणरत्नाभरणः कायस्थकुलतिलकः पाण्डुदासः' (अर्थात् पाण्डुदास
कायस्थ कुल के तिलकरूप हैं एवं गुणरूपी रत्न ही उनके भूषण हैं) इन सब
वाक्यों के उच्चारण करने पर क्रमशः उत्पन्न होनेवाले वर्णों की ही प्रतीति होती
है; किन्तु उच्चारण के अन्त में इन वर्णों से भिन्न किसी (स्फोट रूप) अर्थ का
भान नहीं होता है । यदि ऐसा कहें कि (प्र.) प्रथमतः वर्ण का जो भान होता है,
वह वस्तुतः स्फोट का ही वर्णरूप से भान होता है और अन्त में स्फोट का
स्फोटत्वरूप से भान होता है । (उ.) तो फिर जैसे कि शुक्तिका में रजत ज्ञान को
मिथ्या मानना पड़ता है, वैसे ही स्फोट में वर्णविषयक प्रथम ज्ञान को मिथ्या ही
मानना पड़ेगा । (किन्तु आगे) यह बाधज्ञान भी नहीं होता कि 'ज्ञात होनेवाला
यह वर्ण नहीं है, किन्तु स्फोट है' । वर्णों के समुदाय में जो एकत्व की प्रतीति होती
है, उस प्रतीति का भी विषय उन वर्णों के समुदाय से भिन्न कुछ भी नहीं है, जैसे
कि 'यह वन है' इस प्रतीति का विषय वृक्षसमुदाय से भिन्न स्वतन्त्र वन नाम की
कोई वस्तु नहीं है । 'शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे' यह पञ्चमी एकवचन से युक्त वाक्य
का प्रयोग भी उन वर्णों के समुदाय को ही एक वस्तु मानकर किया जाता है ।
प्रत्यक्ष के द्वारा जिसका सर्वथा ज्ञान होना ही असम्भव है, उस (स्फोट) का अन्य
प्रमाणों के द्वारा निरूपण सम्भव नहीं है; क्योंकि उसके ज्ञान का कोई दूसरा उपाय

६५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे स्फोट-
न्यायकन्दली
प्रत्ययवद् वर्णसमुदायमात्रमवलम्बते । 'शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे' इति वर्णसमुदायमेवोरी-
कृत्य लोकः प्रयुङ्क्ते ।
न च प्रत्यक्षेणाप्रतीयमानः प्रमाणान्तरतः शक्यो निरूपयितुम्, उपायाभावात् ।
अर्थप्रतीत्यन्यथानुपपत्तिस्तदुपाय इति चेत् ? किमप्रतीयमानः स्फोटोऽर्थाधिगमे हेतुः
समर्थितो भवद्भिः ? प्रतीयमानो वा ? अप्रतीयमानस्य हेतुत्वे सर्वदार्थप्रतीतिप्रसङ्गः ।
प्रतीतिश्च तस्य नास्तीत्युक्तम्, अर्थप्रत्ययो वर्णानामेव तद्भावभावितामनुगच्छति, तेनैषामेव
वरं व्युत्पत्त्यनुसारेणार्थप्रतिपादने कश्चिदुपाय आश्रीयताम्, न पुनरप्रतीयमानस्य गगन-
कुसुमस्येव कल्पना युक्ता । न चेदं वाच्यं वर्णानां प्रतिपादकत्वे क्रमभेदे कर्तृभेदे व्यवधाने
च प्रतीतिप्रसङ्ग इति । न हि ते विपरीतक्रमाः कर्तृभेदानुपातिनो देशकालव्यवहितास्त-
दर्थधियः कारणम्, कार्योन्नेया हि शक्तयो भावानाम्, यथा तेभ्यः कार्यं दृश्यते, तथैव
तेषां शक्तयः कल्प्यन्ते । यथोपद्दिशन्ति सन्तः -
यावन्तो यादृशा ये च यदर्थप्रतिपादने ।
वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्यास्ते तथैवावबोधकाः ॥ इति ।
ही नहीं है । अर्थ की प्रतीति से वर्णों में ही उसके अन्वय और व्यतिरेक का
आक्षेप होता है, अतः वर्णों से ही अर्थ की प्रतिपत्ति के लिए कोई उपाय ढूँढ़
निकालना ही युक्त है । यह अनुचित है कि इसके लिए आकाश-कुसुम की तरह
सर्वथा अप्रतीत होनेवाले किसी (स्फोट रूप) अर्थ की कल्पना की जाय । (वर्णों से
ही अर्थ का बोध मानने के पक्ष में) इन दोषों का उद्भावन करना अयुक्त है कि
(प्र.) (वर्णों से ही यदि अर्थ की प्रतीति हो तो) (१) विभिन्न क्रम से पठित शब्दों
से अर्थात् रस सर, वन नव, नदी दीन प्रभृति शब्दयुगलों से समान अर्थविषयक
बोध की आपत्ति होगी; क्योंकि दोनों में समान ही वर्ण हैं । (२) एवं विभिन्न
कर्त्ताओं से उच्चरित विभिन्न वर्णों से (अर्थात् देवदत्त से उच्चरित 'घ' और
यज्ञदत्त से उच्चरित 'ट' शब्द से घटविषयक) बोध की आपत्ति होगी । एवं (३)
व्यवहित वर्णों से (अर्थात् 'घ' के उच्चारण के बाद ककारादि वर्णों का उच्चारण
और उसके बाद उच्चरित 'ट' वर्ण से) घटविषयक बोध की आपत्ति होगी । (उ.)
ये आपत्तियाँ इसलिए नहीं हैं कि उक्त विभिन्न क्रमों से पठित या विभिन्न कर्त्ताओं
से पठित या व्यवहित होकर पठित वर्णों को समान अर्थविषयक बोध का कारण
ही नहीं मानते; क्योंकि किस प्रकार की वस्तुओं में किसकी कारणता है ? यह
केवल कार्य से ही अनुमान किया जा सकता है । जिन वस्तुओं से जिन प्रकार के
कार्यों की उत्पत्ति देखी जाती है, उन वस्तुओं को ही उन कार्यों का कारण माना
जाता है । जैसा कि विद्वानों का उपदेश है कि "जितने एवं जिन वर्णों के
जिस प्रकार के विन्यास में जिन अर्थों के बोध का सामर्थ्य (कार्य से) निश्चित है,