वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७७९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७७९
प्रशस्तपादभाष्यम्
इति । न, आधाराधेयनियमात् । यद्यप्येकः समवायः सर्वत्र
स्वतन्त्रः, तथाप्याधाराधेयनियमोऽस्ति । कथं द्रव्येष्वेव द्रव्यत्वम्, गुणेष्वेव
(उ.) समवाय को एक मान लेने पर भी पदार्थों का उक्त साङ्कर्य नहीं
होगा (क्योंकि एक ही समवाय सम्बन्ध से) कौन किसका आधार है
और कौन किसका आधेय है ? ये दोनों नियमित हैं । विशदार्थ यह है
कि द्रव्यादि सभी अनुयोगियों में यद्यपि एक ही समवाय स्वतन्त्र रूप से है,
फिर भी इस सम्बन्ध से आधेय और आधार नियमित हैं । (प्र.) सभी में
न्यायकन्दली
प्रत्ययस्य लक्षणस्य सर्वत्रावैलक्षण्याद् भेदे प्रमाणाभावाच्च सर्वत्रैकः समवाय इति ।
उपसंहरति-तस्मादिति ।
चोदयति-यद्येक इति । समवायस्यैकत्वे य एव द्रव्यत्वस्य पृथिव्यादिषु योगः, स
एव गुणत्वस्य गुणेषु, कर्मत्वस्य च कर्मसु । तत्र यथा द्रव्यत्वस्य योगः पृथिव्यादिष्वस्तीति
तेषां द्रव्यत्वम्, तथा तद्योगस्य गुणादिष्वपि सम्भवात् तेषामपि द्रव्यत्वम् । यथा च
गुणत्वस्य योगो रूपादिष्वस्तीति रूपादीनां तथा, तद्योगस्य द्रव्यकर्मणोरपि भावात् तयोरपि
गुणत्वं स्यात् । एवं च कर्मस्वपि पदार्थानां सङ्कीर्णता दर्शयितव्या । समाधत्ते-नेति । न च
पदार्थानां सङ्कीर्णता, कुतः ? आधाराधेयनियमात् । न समवायसद्भावमात्रेण द्रव्यत्वम्,
सभी अनुयोगियों में रहनेवाला समवाय एक ही है । 'तस्मात्' इत्यादि वाक्य के
द्वारा इसी प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं ।
'यद्येकः' इत्यादि वाक्यों के द्वारा एक ही समवाय के मानने पर यह आक्षेप
किया गया है कि यदि समवाय एक ही है तो यह मानना पड़ेगा कि पृथिवी प्रभृति
द्रव्यों में द्रव्यत्व का जो समवाय है, वही समवाय गुणों में गुणत्व का भी है । एवं
कर्मों में कर्मत्व का भी है । ऐसी स्थिति में जिस प्रकार पृथिव्यादि में
द्रव्यत्व के समवायरूप सम्बन्ध (योग) के कारण (पृथिव्यादि में) द्रव्यत्व की सत्ता
रहती है, उसी प्रकार गुणादि में भी द्रव्यत्व का समवायरूप योग के
कारण गुणादि में भी द्रव्यत्व की सत्ता माननी पड़ेगी । एवं जैसे कि रूपादि में
गुणत्व के समवायरूप योग के कारण गुणत्व की सत्ता रहती है, उसी प्रकार द्रव्य
में और कर्म में भी गुणत्व की सत्ता माननी पड़ेगी; क्योंकि उनमें भी गुणत्व का
समवाय है । इसी प्रकार कर्मादि पदार्थों में भी द्रव्यत्व, कर्मत्वादि का साङ्कर्य
दिखलाया जा सकता है । 'न' इत्यादि से इसी आक्षेप का समाधान करते हैं ।
अर्थात् समवाय को एक मानने पर भी पदार्थों का उक्त साङ्कर्य दोष नहीं है,
क्योंकि (समवाय एक होने पर भी) उसका आधाराधेयभाव नियमित है ।
७८० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
गुणत्वम्, कर्मस्वेव कर्मत्वमिति । एवमादि कस्मात् ? अन्वयव्यतिरेक-
दर्शनात् । इहेति समवायनिमित्तस्य ज्ञानस्यानन्यदर्शनात्
सर्वत्रैकः समवाय इति गम्यते । द्रव्यादिनिमित्तानां व्यतिरेकदर्शनात्
समवाय के एक होने पर नियम (क्यों कर है?) यतः द्रव्यों में ही
द्रव्यत्व है (गुणादि में नहीं), गुणों में ही गुणत्व है एवं कर्मों में ही कर्मत्व
है । (प्र.) इस प्रकार का अवधारण किस हेतु से सिद्ध होता है? (उ.)
प्रतीतियों के अन्वय और व्यतिरेक से ही उसकी सिद्धि होती है । (विशदार्थ
यह है कि) 'द्रव्यादि सभी अनुयोगियों में एक ही समवाय है' इसका
हेतु है सभी अनुयोगियों में 'यह यहाँ है' इस एक प्रकार की आकार की
प्रतीतियों की सत्ता या अन्वय, इस अन्वय से ही समझते हैं कि समवाय
अपने सभी आश्रयों में एक ही है । एवं 'गुणादि में द्रव्यत्व है' इस प्रकार
की प्रतीतियों के अभावरूप व्यतिरेक से भी समझते हैं कि द्रव्यादि
न्यायकन्दली
किन्तु द्रव्यसमवायाद् द्रव्यत्वम्, समवायश्च द्रव्य एव न गुणकर्मसु, अतो न तेषां
द्रव्यत्वम् । एवं गुणकर्मस्वपि व्याख्येयम् । एतत्संग्रहवाक्यं विवृणोति-यद्यप्येकः समवाय
इत्यादिना । स्वतन्त्रः संयोगवत् सम्बन्धान्तरेण न वर्तत इत्यर्थः । व्यक्तमपरम् ।
पुनश्चोदयति-एवमादि कस्मादिति । द्रव्येष्वेव द्रव्यत्वं वर्तते,
गुणेष्वेव गुणत्वम्, कर्मस्वेव कर्मत्वमित्येवमादि कस्मात् त्वया ज्ञातमित्यर्थः ।
गुणादि में द्रव्यत्व के समवाय के रहने से ही द्रव्यत्व की सत्ता नहीं मानी जा सकती;
क्योंकि (द्रव्यत्व की सत्ता का नियामक) द्रव्यानुयोगिक समवाय है, केवल
समवाय नहीं । (अतः गुणादि में केवल समवाय के रहने पर भी द्रव्यानुयोगिकत्व-
विशिष्ट समवाय के न रहने के कारण गुणादि में द्रव्यत्व की आपत्ति नहीं
दी जा सकती) इसी प्रकार द्रव्य में गुणकर्मादि के और कर्म में गुणद्रव्यादि के
दिये गये साङ्कर्य दोष का भी परिहार करना चाहिए । "यद्यप्येकः समवायः"
इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा उक्त अर्थ के बोधक (यद्येकः समवाय इत्यादि) संक्षिप्त
वाक्य का ही विवरण दिया गया है । समवाय 'स्वतन्त्र' है अर्थात् संयोग की
तरह किसी दूसरे सम्बन्ध के द्वारा अपने आश्रय में नहीं रहता है (वह
अपने स्वरूप से ही द्रव्यादि आश्रयों में रहता है) । (उक्त त्र्यपद वर्णनारूप
भाष्य के) और अंश स्पष्ट हैं । 'एवमादि कस्मात्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा
इसी प्रसङ्ग में पुनः आक्षेप करते हैं । अर्थात् किस हेतु से तुमने ये सब
बातें समझीं कि द्रव्यत्व द्रव्यों में ही रहता है, गुणत्व गुणों में ही रहता है एवं