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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५१५

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५१५
न्यायकन्दली
प्रतिपाद्यमानतया दशसंख्यया सह सम्बन्धान्तराभावेन तद्विशिष्टप्रतिपादनायोगात् । नाप्यन-
योरकदेशता, नाप्येककालत्वम्, कथमन्नुमानप्रवृत्तिः ? क्रयविक्रयव्यवहारे वणिजां तथा-
विधतर्जनीविन्यासस्य दशसंख्याप्रतिपादनाभिप्रायाव्यभिचारोपलम्भात् । कर्तुस्तत्प्रति-
पादनाभिप्रायोऽवगतिमुखेनास्य दशसंख्याप्रतीतिहेतुत्वमिति चेत् ? शब्दस्याप्येवमेव । प्रथमं
गोशब्दादुच्चारिताद् वक्तुः ककुदादिमदर्थविवक्षा गम्यते, स्वसन्ताने गोशब्दोच्चारणस्य
पदार्थविवक्षापूर्वकत्वोपलम्भात् । तदर्थविवक्षा चार्थानुमानम् । अयं चात्र प्रयोगः —
पुरुषो धर्मी ककुदादिमदर्थविवक्षावान्, गोशब्दोच्चारणकर्तृत्वादहमिवेति । अर्थाभावेऽप्य-
नाप्तानां विवक्षोपलब्धेर्न विवक्षातोऽर्थसिद्धिरिति चेत् ? शब्दादपि कथं तत्सिद्धिः ?
संख्या तो इस अनुमान का पक्ष हो नहीं सकती; क्योंकि वह पहले से प्रतीत नहीं
है । तर्जनी का ऊपर उठाना (विन्यास) भी उस अनुमान का धर्मी नहीं हो
सकता; क्योंकि इस अनुमान के द्वारा मुख्य ज्ञेय दश संख्या के साथ उसका कोई
(सङ्केत सम्बन्ध को छोड़कर) दूसरा (स्वाभाविक संयोग समवायादि) सम्बन्ध नहीं
है । अतः दश संख्यारूप साध्य धर्म से युक्त तर्जनीविन्यासरूप धर्मी का बोध इस
अनुमान के द्वारा नहीं हो सकता; क्योंकि तर्जनीविन्यास और प्रकृत दश संख्या न
एक काल के हैं, न एक देश के । अतः तर्जनी के उक्त विशेष प्रकार के विन्यास
से दश संख्या में जो अनुमान की प्रवृत्ति होती है, वह कैसे हो सकेगी ? यदि यह
कहें कि (प्र०) खरीद-बिक्री के प्रसङ्ग में बनियों में यह अव्यभिचरित नियम
प्रचलित है कि केवल तर्जनी को उठाने से दश संख्या को समझना, अतः उक्त
तर्जनी-विन्यास से तर्जनी को ऊपर उठानेवाले पुरुष के इस अभिप्राय का बोध
होता है कि 'तर्जनी को ऊपर उठाने से इस पुरुष को दश संख्या का बोध
अभिप्रेत है' । इसी रीति से इसके बाद तर्जनी के उक्त विन्यास से दश संख्या का
अनुमान होता है । (उ.) तो फिर शब्द से अर्थानुमान के प्रसङ्ग में भी यही रीति
समझिए कि (श्रोता) पुरुष को वक्ता के द्वारा उच्चरित गो शब्द (के श्रवण)
से ककुदादि धर्मों से युक्त (बैल) जीव को समझाने के लिए वक्ता के शब्द-प्रयोग
की इच्छा (विवक्षा) ज्ञात होती है; क्योंकि श्रोता अपने ज्ञात शब्द समूहों में
से जब गोशब्द का उच्चारण करता है, उससे पूर्व उसे ककुदादि से युक्त अर्थ
की विवक्षा का अपने में बोध होता है । इस प्रसङ्ग में अनुमान का प्रयोग
इस प्रकार है कि जिस प्रकार मेरे द्वारा गोशब्द के उच्चारण से पहले मुझमें
ककुदादि धर्मों से युक्त अर्थ की विवक्षा रहती है, उसी प्रकार यह गोशब्द का
उच्चारण करनेवाला पुरुषरूप धर्मी भी ककुदादि धर्मों से युक्त अर्थ की विवक्षा से
युक्त है; क्योंकि यह भी गोशब्द के उच्चारण का कर्त्ता है । (प्र.) अर्थ की सत्ता
न रहने पर भी अनाप्त (अविश्वास्य) लोगों में उस अर्थ की विवक्षा देखी
जाती है, अतः विवक्षा से अर्थ की सिद्धि नहीं की जा सकती । (उ.) शब्द

५१६ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने शब्दान्तर्भाव-
न्यायकन्दली
भ्रान्त्या विप्रलम्भधिया वार्थशून्यस्य शब्दस्य प्रयोगात् । आप्तोक्ताच्छब्दार्थप्रतीतिरिति
चेत् ? आप्ताभिप्रायोदेवार्थस्याधिगतिरिति समानार्थः ।
यस्तु सत्यपि लिङ्गत्वे देशविशेषे शब्दस्यार्थ(स्य) व्यभिचारो न धूमस्य, तत्रैष न्यायः ।
धूमः स्वाभाविकेन सम्बन्धेनाग्नेर्लिङ्गम् । शब्दस्तु चेष्टावत् पुरुषेच्छाकृतेन सङ्केतेन
प्रवर्तमानो यत्र यत्रार्थे पुरुषेण सङ्केत्यते तस्य तस्यैवार्थस्य विवक्षायतिद्वारेण लिङ्गम् ।
अत एवास्मादाप्तप्रयुक्तस्यानुसारेण चेष्टादिवत् तावदर्थनिश्चये सातत्योर्ध्वंगत्वादिधर्म-
विशिष्टस्येव धूमस्याप्तोक्तस्यैव शब्दस्यार्थाव्यभिचारसम्भवात् ।
शब्दस्यार्थप्रतिपादनं मुख्यया वृत्त्या किं न कल्प्यते ? सम्बन्धा-
भावात्, असम्बद्धस्य गमकत्वे चातिप्रसङ्गात् । अस्ति स्वाभाविकः
(को अलग प्रमाण मान लेने) से ही अर्थ की सिद्धि क्यों कर होगी ? क्योंकि
अभिधा की भ्रान्ति से अथवा श्रोता को ठगने के लिए ऐसे शब्दों का भी प्रयोग
होता है जिनके वे अर्थ सम्भावित नहीं रहते । (प्र.) आप्तजनों के द्वारा उच्चरित
शब्द से ही अर्थ की प्रतीति होती है । (उ.) इसके बदले यह भी तो कह सकते हैं
कि आप्तपुरुष के द्वारा प्रयुक्त शब्द के श्रवण से श्रोता को उनके अभिप्राय का
बोध होता है एवं उस अभिप्राय से अर्थविषयक अधिगति (अनुमिति) होती है ।
यह जो कहा गया है कि "शब्द यद्यपि अर्थ का (ज्ञापक) लिङ्ग है, किन्तु
किसी विशेष प्रकार के देश में शब्द का भी अर्थ के साथ व्यभिचार उपलब्ध होता
है, किन्तु धूम में वह्नि का व्यभिचार कहीं भी उपलब्ध नहीं होता, (अतः धूम से
वह्नि का अनुमान होता है, किन्तु शब्द से अर्थ का अनुमान नहीं हो सकता)" ।
इस प्रसङ्ग में यह युक्ति है कि धूम (संयोग रूप) स्वाभाविक सम्बन्ध से वह्नि का
ज्ञापक हेतु है, किन्तु शब्द में यह बात नहीं है । जिस प्रकार पुरुषकृत सङ्केत के
द्वारा तर्जन्यादि के विशेष विन्यास रूप चेष्टा से दश संख्या का अनुमान होता है,
उसी प्रकार शब्द भी पुरुष की बोधनेच्छा रूप सङ्केत के द्वारा ही अर्थबोध के लिए
प्रवृत्त होता है । अतः पुरुष का सङ्केत जिन अर्थों में जिन शब्दों का रहता है,
उन्हीं अर्थों के वे शब्द विवक्षा के बोध के द्वारा ज्ञापक लिङ्ग होते हैं । जिस प्रकार
चेष्टा रूप हेतु से (बनियों के सङ्केत के द्वारा दश संख्या प्रभृति) अर्थों का बोध
होता है, उसी प्रकार शब्दों से उसके आप्तोक्तत्व के कारण ही अर्थ का बोध होता
है । अतएव जिस प्रकार अविच्छिन्नमूला एवं ऊर्ध्वमुखी रेखा से युक्त धूम में वह्नि
का अव्यभिचार सम्भव होता है, उसी प्रकार आप्त से उच्चरित शब्द में भी अर्थ
का अव्यभिचार (व्याप्ति) भी सम्भव है ।
(प्र.) अभिधा रूप मुख्य वृत्ति से ही शब्द के द्वारा अर्थ का प्रतिपादन क्यों
नहीं मान लेते ? (उ.) चूँकि शब्द का अर्थ के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है ।