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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६४१
प्रशस्तपादभाष्यम्
द्रवत्वं स्यन्दनकर्मकारणम् । त्रिद्रव्यवृत्ति । तत्तु द्विविधम् -
जिस गुण से स्यन्दन (अर्थात् फैलने की) क्रिया उत्पन्न हो, वही
'द्रवत्व' है । यह १. सांसिद्धिक (स्वाभाविक) और २. नैमित्तिक
न्यायकन्दली
हि नो गुरुत्वम् । एतेनैतत् प्रत्युक्तं यदुक्तमपरैः- "अवयविगुरुत्वकार्यस्य न्नतिविशेष-
स्यानुपलम्भादवयविनि गुरुत्वाभावः" इति, अवयविनः पतनाभावप्रसङ्गात् । अथावयवानां
गुरुत्वादेव तस्य पतनम् ? तदावयवानामपि स्वावयवगुरुत्वात् पतनमिति सर्वत्र कार्ये
तदुच्छेदः । अथ व्यधिकरणेभ्यः स्वावयवगुरुत्वेभ्योऽवयवानां पतनासम्भवात् तेषु गुरुत्वं
कल्प्यते, तदा अवयविन्यपि कल्पनीयम्, न्यायस्य समानत्वात् । यत् पुनरवयविगुरुत्वस्य
कार्यातिरेको न गृह्यते, तदवयवावयविगुरुत्वभेदस्याल्पान्तरत्वात् । यथा महति द्रव्ये
उन्मीयमाने तत्पतितसूक्ष्मद्रव्यान्तरगुरुत्वकार्याग्रहणम् ।
क्योंकि अवयवों के गुरुत्व से जितनी अवनति होती है, उन अवयवों से बने
अवयवी के द्वारा उससे अधिक अवनति नहीं देखी जाती है, अतः अवयवों में ही
गुरुत्व है, अवयवी में नहीं । गुरुत्व के उक्त लक्षण से उनके उक्त मत का भी
खण्डन हो जाता है (क्योंकि उस लक्षण में गुरुत्व को अवयवी में रहना मान लिया
गया है); क्योंकि अवयवी में गुरुत्व यदि न मानें तो अवयवी का पतन न हो
सकेगा । यदि अवयवों के गुरुत्व से ही अवयवी का पतन मानें, तो फिर उन
अवयवों का पतन भी उनके अवयवों से ही होगा । उनमें भी गुरुत्व का मानना
व्यर्थ होगा । फलतः किसी भी कार्य द्रव्य में गुरुत्व का मानना सम्भव न होगा ।
यदि यह कहें कि एक अधिकरण में रहनेवाले गुरुत्व से उससे भिन्न द्रव्य में पतन
का होना सम्भव नहीं है, अतः अवयवों में गुरुत्व मानते हैं (क्योंकि अवयवों से
उसके अवयव भिन्न हैं), तो फिर इसी युक्ति से अवयवी में भी गुरुत्व का मानना
अनिवार्य है; क्योंकि अवयवों के अवयव भी तो अपने अवयवी से भिन्न हैं, अतः
अवयवों में रहनेवाला गुरुत्व अवयवों से भिन्न अवयवी में पतन का उत्पादन कैसे
कर सकता है ? यह जो आक्षेप किया गया है कि अवयवों के गुरुत्व कार्य
अवनति-विशेष से अवयवी के कार्य अवनतिविशेष में कोई अन्तर उपलब्ध नहीं
होता (अतः अवयवों में ही गुरुत्व है अवयवी में नहीं), इस आक्षेप के उत्तर में
कहना है कि अवयवी के गुरुत्व से अवयवों के गुरुत्व में अत्यन्त अल्प अन्तर है,
अतः दोनों से होनेवाले कार्यों का अन्तर गृहीत नहीं हो पाता । जैसे किसी भारी
द्रव्य को दूसरी बार तौलने पर उससे कुछ कणों के झड़ जाने के बाद भी उसके
गुरुत्व के कार्य अवनतियों में कोई अन्तर उपलब्ध नहीं होता है ।

६४२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे द्रवत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
सांसिद्धिकम्, नैमित्तिकं च । सांसिद्धिकमपां विशेषगुणः । नैमित्तिकं
पृथिवीतेजसोः सामान्यगुणः । सांसिद्धिकस्य गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्व-
निष्पत्तयः । सङ्घातदर्शनात् सांसिद्धिकमयुक्तमिति चेत्, न, दिव्येन तेजसा
संयुक्तानामाप्यानां परमाणूनां परस्परं संयोगो द्रव्यारम्भकः सङ्घा-
भेद से दो प्रकार का है । इनमें सांसिद्धिक द्रवत्व जल का विशेषगुण है
और नैमित्तिक द्रवत्व पृथिवी और तेज का सामान्यगुण है । द्रवत्व के
नित्यत्व और अनित्यत्व का निर्णय गुरुत्व की तरह समझना चाहिए ।
(प्र.) (जल में भी) सङ्घात अर्थात् काठिन्य देखा जाता है, अतः यह
कहना अयुक्त है कि जल का द्रवत्व सांसिद्धिक है ।
न्यायकन्दली
संयोगप्रयत्नसंस्कारविरोधि । गुरुत्वस्य संयोगेन प्रयत्नेन वेगाख्येन च संस्कारेण सह
विरोधो विद्यते, तैः प्रतिबद्धस्य स्वकार्याकरणात् । तथा च दोलारूढस्य संयोगेन
प्रतिबन्धादपतनम्, प्रयत्नेन प्रतिबन्धादपतनं च शरीरस्य, वेगेन प्रतिबन्धादपतनं बहिः-
क्षिप्तस्य शरशलाकादेः ।
अस्य चाबादिपरमाणुरूपादिवन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः । यथाप्यपरमाणुरूपादयो नित्या-
स्तथा पार्थिवाप्यपरमाणुष्वपि गुरुत्वम् । यथा चाबादिकार्यद्रव्ये कारणगुणपूर्वकप्रक्रमेण
रूपादयो जायन्ते, आश्रयविनाशाच्च विनश्यन्ति, तथा गुरुत्वमपि ।
'संयोगप्रयत्नसंस्कारविरोधी' । गुरुत्व का विरोध (अर्थात् अपने आश्रय के
अधःपतन रूप कार्य में अक्षमता) संयोग, प्रयत्न और वेगाख्य संस्कार इन तीन
गुणों से होता है; क्योंकि इनमें से किसी के साथ भी सम्बन्ध रहने पर गुरुत्व से
पतन की उत्पत्ति नहीं होती है । संयोग से प्रतिरुद्ध होने के कारण ही पालकी पर
चढ़े हुए मनुष्य का पतन नहीं होता है । प्रयत्नरूप प्रतिबन्धक से ही शरीर का
पतन नहीं होता है । केवल वेग के ही कारण बाहर फेंका हुआ तीर (कुछ देर
तक) रुका रहता है ।
'अस्य चाबादिपरमाणुरूपादिवन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः' अर्थात् जिस प्रकार
जलीय परमाणुओं के रूपादि नित्य होते हैं, उसी प्रकार पार्थिव परमाणु और
जलीय परमाणु का गुरुत्व भी नित्य है । जैसे कार्यरूप जल में कारणगुणक्रम से
रूपादि की उत्पत्ति होती है एवं आश्रय के विनाश से उनका विनाश होता है, उसी
प्रकार कार्यरूप पार्थिव द्रव्य और जलीय द्रव्य इन दोनों के गुरुत्व भी
कारणगुणक्रम से ही उत्पन्न होते हैं और आश्रय के विनाश से ही विनष्ट होते हैं ।