वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५७
न्यायकन्दली
यार्थजत्वं तद्भावभावित्वान्निर्विकल्पकज्ञाने प्रतीयत इति व्यापकविरुद्धोपलब्धिः । विपक्षे
यत् स्मृतिपूर्वकं तदप्रत्यक्षं यथानुमानज्ञानम्, स्मृतिपूर्वकं च सविकल्पकज्ञानमिति प्रतिप-
क्षानुमानमप्यस्तीति चेत् ? प्रत्यक्षत्वं यदि क्वचिदवगतम्, तदा सविकल्पके तस्य न प्रतिषेधः,
प्राप्तिपूर्वकत्वात् प्रतिषेधस्य । अथ निर्विकल्पके प्रतीतम्, तत् कथं प्रतीतम् ? इन्द्रियार्थ-
तद्भावभावित्वानुमानेनेति चेत् ? तर्हि प्रत्यक्षत्वप्रसाधकस्य तद्भावभावित्वानुमानस्य
प्रामाण्याभ्युपगमे सति प्रत्यक्षत्वप्रतिषेधकानुमानं प्रवृत्तं तद्विपरीतवृत्ति अश्रावणः शब्द
इतिवत् तेनैव बाध्यते । एवं तावच्छब्दसंयोजनात्मिका प्रतीतिः कल्पना न भवतीति ।
अर्थसंयोजनात्मिकापि विशिष्टग्राहिणी न कल्पना, विशेषणस्य विशेष्यञ्च
च तयोः सम्बन्धस्य च व्यवच्छेद्यव्यवच्छेदकभावस्य वास्तवत्वात् ।
अर्थावग्रहं विज्ञानम्, तदर्थेन्द्रियसन्निकर्षाद् यथाभूतोऽर्थस्तथोपजायते न त्वर्थे
होती है एवं प्रत्यक्ष में नहीं होती है, उसी प्रकार और भी जिन ज्ञानों में स्मृति
की अपेक्षा होगी वे प्रत्यक्ष नहीं हो सकते । सविकल्पक ज्ञान में भी (वाचक शब्द
की) स्मृति अपेक्षित होती है, अतः वह भी प्रत्यक्ष नहीं हो सकता । (उ.) जिसका
प्रतिषेध सविकल्पक ज्ञान में करते हैं, वह प्रत्यक्षत्व कहीं पर ज्ञात है, या नहीं ?
यदि नहीं, तो फिर सविकल्पक ज्ञान में भी उसका प्रतिषेध नहीं किया जा सकता,
क्योंकि जिसकी कहीं सत्ता ज्ञात रहती है उसी का कहीं प्रतिषेध भी किया जाता
है । यदि इसका यह उत्तर देंगे कि 'यह प्रत्यक्षत्व निर्विकल्पक ज्ञान में ही ज्ञात है'
तो फिर यह पूछेंगे कि किस हेतु से आपने निर्विकल्पक ज्ञान में प्रत्यक्षत्व को
समझा ? यदि उसका यह उत्तर देंगे कि 'चूँकि निर्विकल्पक ज्ञान इन्द्रिय और
अर्थ से उत्पन्न होता है' अतः प्रत्यक्ष है , तो फिर यह स्वीकृत ही हो जाता है कि
'इन्द्रियार्थजत्व हेतु से जो प्रत्यक्षत्व का अनुमान होता है, वह प्रमाण है' इसके बाद
यदि कोई यह अनुमान करेगा कि 'इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न भी सविकल्पक
ज्ञान प्रमाण नहीं है' तो यह 'अश्रावणः शब्द' इस अनुमान की तरह धर्मिग्राहक
प्रमाण से ही बाधित हो जाएगा । अतः कल्पना 'शब्दसंयोजनात्मिका' है, इस पक्ष
में भी सविकल्पक ज्ञान का प्रामाण्य खण्डित नहीं हो सकता ।
यदि कल्पना को अर्थ संयोजनरूप विशिष्ट विषयक ज्ञान से अभिन्न मानें, तो भी
सविकल्पक ज्ञान इस प्रकार की कल्पना रूप होने पर भी प्रमाण होगा ही, क्योंकि विशिष्ट
ज्ञान में विशेष्य, विशेषण और दोनों का व्यवच्छेद्य-व्यवच्छेदक-भाव सम्बन्ध ये तीन
वस्तुएँ भासित होतीहैं, विशिष्टज्ञान के विषय ये तीनों ही विषय वास्तव हैं, आरोपित
नहीं (अतः सविकल्पक ज्ञान केवल विशिष्ट विषयक होने से ही अप्रमाण नहीं हो
४५८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष-
न्यायकन्दली
विचार्य प्रवर्तते । विशिष्टज्ञानं तु विचार इदं विशेष्यमयमनयोः सम्बन्ध एषा च
लोकस्थितिः । दण्डी पुरुषो न तु पुरुषो दण्ड इति विचार्य च प्रत्येकमेतानि
पश्चादेकीकृत्य गृह्णाति दण्डी पुरुष इति । यद्यर्थस्य विशिष्टता वास्तवी प्रथममेव
विशिष्टज्ञानं जायेत । न भवति चेत् ? नास्य स्वरूपतो विशिष्टता, किन्तूपा-
धिकृतेति विशिष्टज्ञानं कल्पनेति चेत् ? दुरुहितमिदमायुष्मता, आत्मा हि
प्रत्येकं विशेषणादीन् गृहीत्वा ताननुसन्दधान इन्द्रियेणार्थस्य विशिष्टतां प्रत्येति न
ज्ञानमचेतनम्, तस्य प्रतिसन्धानाशक्तेः, विरम्य व्यापाराभावाच्च । अर्थो विशेषण-
सम्बन्धाद् विशिष्ट एव, विशेषणादिग्रहणस्य सहकारिणोऽभावात् । प्रथममिन्द्रियेण
न तथा गृह्यते, गृहीतेषु विशेषणादिषु गृह्यत इत्यर्थेन्द्रियजं तावद्विशिष्टज्ञानम् । यदि
सकता)। (प्र.) इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न होनेवाले ज्ञान में अर्थ अपने वास्तविक
रूप में ही भासित होता है । किन्तु वह विचार पूर्वक अपने विषय को प्रकाशित
करने के लिए प्रवृत्त नहीं होता । 'यह विशेषण है, यह विशेष्य है, यह उन दोनों
का सम्बन्ध है' इस प्रकार के विचार से ही तो 'विशिष्ट ज्ञान' की उत्पत्ति होती
है, क्योंकि विशिष्ट ज्ञान के सम्बन्ध में साधारण जनों की स्थिति इस प्रकार है कि
'दण्ड ही विशेषण है और पुरुष ही विशेष्य है, किन्तु इसके विपरीत लोक में यह
व्यवहार नहीं है कि 'पुरुष ही विशेषण है और दण्ड ही विशेष्य है' इस प्रकार के
विचार के बाद दण्ड, पुरुष एवं दोनों के सम्बन्ध इन तीनों को एक ज्ञान में
आरूढ कर 'दण्डी पुरुषः' इत्यादि आकार की विशिष्ट प्रतीतियाँ होती हैं। ऐसी
स्थिति में पुरुष की दण्डविशिष्टता अर्थात् अर्थ की विशिष्टता यदि वास्तव-वस्तु
हो, तो फिर पहिले ही इन्द्रियपात होते ही 'विशिष्टबोध' की ही उत्पत्ति होती, सो
नहीं होती है, अतः समझना चाहिए कि विशेषण विशिष्टता अर्थ का स्वाभाविक
धर्म नहीं है, किन्तु औपाधिक धर्म है (जैसे कि जवाकुसुम संनिहित स्फटिक का
लौहित्य) अतः विशिष्ट विषयक ज्ञान (अर्थात् सविकल्पक ज्ञान) प्रमा रूप नहीं
है । (उ.) यह तो आप की बड़ी ही विचित्र कल्पना है, क्योंकि आत्मा पहिले
विशेषणादि को जानकर फिर उनकी स्मृति की सहायता से इन्द्रिय के द्वारा अर्थ
की विशिष्टता का भी अनुभव करता है । यह सब काम ज्ञान के द्वारा नहीं हो
सकता; क्योंकि वह अचेतन है, एवं (क्षणिक होने के कारण) एक व्यापार के
बाद दूसरे व्यापार की क्षमता भी ज्ञान में नहीं है । विशेषण से युक्त होने के
कारण ही अर्थ 'विशिष्ट' कहलाता है (विशिष्ट रूप से गृहीत होने के कारण
नहीं) इन्द्रिय के प्रथम सम्पात के बाद ही जो विशिष्ट बुद्धि की उत्पत्ति नहीं होती
है, उसका कारण है विशेषण ज्ञान रूप सहकारि कारण का अभाव । इस स्थिति
में यदि विशिष्टबुद्धि रूप होने के अपराध से ही विशिष्ट ज्ञान (सविकल्पक ज्ञान)