वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८१
प्रशस्तपादभाष्यम्
नुमेयधर्मान्विते चान्यत्र सर्वस्मिन्नेकदेशे वा प्रसिद्धमनुमेयविपरीते च सर्वस्मिन्
प्रमाणतोऽसदेव, तदप्रसिद्धार्थस्यानुमापकं लिङ्गं भवतीति ।
रहे, अनुमेयरूप धर्म के किसी (निश्चित) अधिकरण में या सभी अधिकरणों
में जिसकी सत्ता प्रमाण के द्वारा सिद्ध रहे, एवं साध्य के अभाव
के निर्णीत अधिकरण में जिसकी असत्ता भी प्रमाण के द्वारा निश्चित
ही हो, वही वस्तु पूर्व में अज्ञात साध्य के अनुमिति का लिङ्ग है ।
न्यायकन्दली
विरुद्धं सपक्षे नास्ति, विपक्षाद्व्यावृत्तमिति तस्य द्वितयेन लिङ्गलक्षणेन रहितत्वम् ।
यदनुमेयेन सम्बद्धमिति श्लोकार्थं विवृणोति-यदनुमेयेनेति । अनुमेयेनार्थेन साध्य-
धर्मिणा सह यद्देशविशेषे कालविशेषे वा सहचरितं सम्बद्धम्, अनुमेयधर्मान्विते चान्यत्र
सपक्षे सर्वस्मिन्नेकदेशे वा प्रसिद्धं प्रमाणेन प्रतीतम्, अनुमेयविपरीते च साध्यव्यावृत्ति-
विषये चार्थे सर्वस्मिन् प्रमाणतोऽसदेव तदप्रसिद्धार्थस्य साध्यधर्मिणोऽप्रतीतस्यार्थस्य
साध्यधर्मस्यानुमापकं लिङ्गं भवति । यावति देशे काले वा दृष्टान्तधर्मिणि लिङ्गस्य
साध्यधर्मेणाविनाभावो प्रदर्शितस्तावत्येव देशे काले वा साध्यधर्मिणि प्रतीयमानस्य
गमकमिति प्रतिपादनार्थमुक्तम्-देशविशेषे कालविशेषे वा सहचरितमिति । सर्वस-
पक्षव्यापकवत् सपक्षैकदेशवृत्तेरपि हेतुत्वार्थं सर्वस्मिन्नेकदेशे वा प्रसिद्धमित्युक्तम् । समस्त-
हेत्वाभास हैं) विरुद्ध नाम का हेत्वाभास सपक्ष में नहीं रहता और विपक्ष में रहता
है, अतः विरुद्ध सपक्षवृत्तित्व और विपक्षव्यावृत्तत्व हेतु के इन दोनों लक्षणों से
रहित हेत्वभास है ।
'यदनुमेयेनार्थेन' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इत्यादि श्लोक की
व्याख्या करते हैं । पहले से अज्ञात अर्थ स्वरूप साध्य (धर्म) की अनुमिति का जनक
वह 'लिङ्ग' है, जो अनुमेय अर्थ के साथ अर्थात् साध्य के धर्मी (पक्ष) के साथ किसी
देश विशेष में एवं कालविशेष में 'सहचरित' अर्थात् सम्बद्ध हो, एवं अनुमेय (साध्य)
रूप धर्म से युक्त (पक्ष से भिन्न) किसी आश्रयरूप सपक्ष के किसी एक देश में या उसके
सभी देशों में 'प्रसिद्ध' हो, अर्थात् प्रमाण के द्वारा निश्चित हो, एवं अनुमेय के
विपरीत अर्थात् साध्य का अभाव जिनमें निश्चित हो, उन सभी आश्रयों में प्रमाण
के द्वारा जिसकी असत्ता भी निश्चित ही हो (वही लिङ्ग है) । 'देशविशेषे कालविशेषे
वा सहचरितम्' यह वाक्य इस लिए लिखा गया है कि दृष्टान्तरूप धर्मी के जितने
देश में एवं जितने काल में हेतु का साध्यरूप धर्म के साथ 'अविनाभाव' (व्याप्ति)
देखा जाय, उन्हीं देशों में और उन्हीं कालों में साध्य के धर्मी (पक्ष) में जाते हुए
साध्य का वह हेतु ज्ञापक होता है । 'सर्वस्मिन्नेकदेशे वा प्रसिद्धम्' यह वाक्य इस
४८२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणे अनुमान-
न्यायकन्दली
विपक्षव्यापकवद्विपक्षैकदेशवृत्तेरप्यहेतुत्वद्योतनार्थं सर्वस्मिन्नसन्नेवेति पदम् ।
केचित् प्रवाडुका एवं वदन्ति-नावश्यं प्रमाणसिद्धो वैधर्म्यदृष्टान्त एव द्रष्टव्यः,
'यत्रेदमपि नास्ति तत्रेदमपि नास्ति' इति वचनादपि साध्यव्यावृत्त्या साधनव्यावृत्ति-
प्रतीतिसम्भवात् । तथा च तेषां ग्रन्थः-
तस्माद् वैधर्म्यदृष्टान्तोऽनिष्टोऽवश्यमिहाश्रयः ।
तदभावेऽपि तन्नेति वचनादपि तद्गतेः ॥ इति ।
तन्निवृत्त्यर्थं प्रमाणत इति । साध्यविपरीते यत् प्रमाणतोऽसल्लिङ्गं न तु वाङ्मात्रेणेत्यर्थः ।
प्रमाणशून्यस्य वचनमात्रस्य सर्वत्र सम्भवे हेतुहेत्वाभासव्यवस्थानुपपत्तिप्रसङ्गः । अतिव्यापक-
मिदं लिङ्गलक्षणम्, प्रकरणसमे कालात्ययापदिष्टे च भावादिति चेत् ? अत्राह कश्चित्-
प्रकरणसमकालात्ययापदिष्टावनैकान्तिक एवान्तर्भवतः, संदिग्धविपक्षे साध्यधर्मिणि प्रकरण-
समस्य भावान्निश्चितविपक्षे च कालात्ययापदिष्टस्य वृत्तेः । यथा च प्रकरणसमः 'यतः प्रकरण-
लिए लिखा गया है कि जिस प्रकार सभी सपक्षों (दृष्टान्तों) में रहनेवाली वस्तु में
(साध्य के ज्ञापन करने का सामर्थ्यरूप) हेतुत्व है, उसी प्रकार कुछ ही सपक्षों में
रहनेवाली वस्तु में भी उक्त हेतुत्व है । 'सर्वस्मिन्नसदेव' यह वाक्य इसलिए दिया गया
है कि जिस प्रकार सभी विपक्षों में रहनेवाला पदार्थ भी साध्य का ज्ञापक हेतु नहीं
हो सकता, उसी प्रकार कुछ थोड़े से विपक्षों में रहनेवाला पदार्थ भी साध्य का
ज्ञापक हेतु नहीं हो सकता । किसी सम्प्रदाय के लोगों (बौद्धों) का कहना है कि
'वैधर्म्य दृष्टान्त में प्रमाण के द्वारा हेतु की असत्ता सिद्ध ही हो' यह कोई आवश्यक
नहीं है, क्योंकि 'जहाँ साध्य नहीं है, वहाँ हेतु भी नहीं है' इस प्रकार के साधारण
वाक्य से ही साध्य से शून्य सभी आश्रयों (सभी विपक्षों) में हेतु की असत्ता की
प्रतीति हो सकती है । जैसा कि उन लोगों का (उक्त सिद्धान्त का समर्थक) यह
वचन है कि "तस्मात् अनुमान के लिए वैधर्म्य दृष्टान्तरूप आश्रय (प्रयोजक) का
मानना आवश्यक नहीं है, क्योंकि 'जहाँ साध्य नहीं है, वहाँ हेतु भी नहीं है' इस
वाक्य से भी उस (साध्यशून्य आश्रय में हेतु के अभाव) की प्रतीति हो जाएगी"
इस सिद्धान्त के खण्डन के लिए ही प्रकृत वाक्य में 'प्रमाणतः' पद दिया गया है ।
अर्थात् विपक्ष में हेतु की असत्ता प्रमाण से ही सिद्ध होनी चाहिए, प्रमाणशून्य
केवल वचन मात्र के प्रयोग से प्रकृत में समाधान नहीं होगा, क्योंकि प्रमाणशून्य
वचनों का प्रयोग तो सभी जगह सम्भव है, इससे 'यह हेतु है और हेत्वाभास है'
इस प्रकार की व्यवस्था ही नहीं रह जाएगी । (प्र.) हेतु का यह लक्षण तो
'प्रकरणसम' और 'कालात्ययापदिष्ट' नाम के हेत्वाभासों में भी रहने के कारण
अतिव्यापक (अतिव्याप्त) है । इसके उत्तर में कोई कहते हैं कि (उ.) प्रकरणसम
और कालात्ययापदिष्ट इन दोनों का अन्तर्भाव भी 'अनैकान्तिक' नाम के हेत्वाभास
में ही हो जाता है, क्योंकि सन्दिग्धविपक्ष रूप साध्य के धर्मी में (अर्थात् पक्ष में)