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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६९५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६९५
प्रशस्तपादभाष्यम्
स चोर्ध्वं गच्छन् कण्ठादीनभिहन्ति, ततः स्थानवायुसंयोगापेक्षमाणात् स्थाना-
काशसंयोगाद् वर्णोत्पत्तिः ।
अवर्णलक्षणोऽपि भेरीदण्डसंयोगापेक्षाद् भेर्याकाशसंयोगादुत्पद्यते ।
वेणुपर्वविभागाद् वेण्याकाशविभागाच्च शब्दाच्च संयोगविभागनिष्पन्नाद्
वीचीसन्तानवच्छब्दसन्तान इत्येवं सन्तानेन श्रोत्रप्रदेशमागतस्य
यह सक्रिय वायु ऊपर की तरफ जाते समय कण्ठ में अभिघात को उत्पन्न
करता है । इसके बाद (कण्ठादि) स्थान और वायु का संयोग एवं (कण्ठादि)
स्थान और आकाश के संयोग इन दोनों संयोगों से वर्णात्मक शब्द की
उत्पत्ति होती है ।
भेरी (प्रभृति) और दण्ड (प्रभृति) का संयोग एवं भेरी (प्रभृति) और
आकाश का संयोग, इन दोनों संयोगों से अवर्ण (ध्वनि) रूप शब्द की उत्पत्ति
होती है । बाँस और उसकी सन्धि (गाँठ) के विभाग एवं बाँस और आकाश
का विभाग इन दोनों विभागों से शब्द की उत्पत्ति होती है । संयोग और
विभाग से निष्पन्न जलतरंगों के समूह की तरह शब्द से भी शब्द
के तरंगों के समूहों की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार शब्द के
न्यायकन्दली
शब्दान्तरम्, ततोऽप्यनयोर्गमनागमनाभावात् प्राप्तस्यैवोपलब्धिरिति, ततोऽप्यन्यत्,
ततोऽप्यन्यदित्यनेन क्रमेण शब्दसन्तानो भवति । एवं सन्तानेन श्रोत्रदेशे समागतस्यान्य-
शब्दस्य ग्रहणम् ।
नन्वेषा कल्पना कुतः सिद्धयतीत्यत आह- श्रोत्रशब्दयोरिति । न श्रोत्रं शब्ददेशमुप-
गच्छति, नापि शब्दः श्रोत्रदेशम्, तयोर्निष्क्रियत्वात् । अप्राप्तस्य ग्रहणं नास्ति, इन्द्रियाणां
प्राप्यकारित्वात् । प्रकारान्तरेण चोपलब्धिर्न घटते । दृष्टा च वीचीसन्ताने स्वोत्पत्तिदेशे
विनश्यतामपि स्वप्रत्यासत्तिमपेक्ष्य तदव्यवहिते देशे सदृशकार्यारम्भपरम्परया देशान्तर-
प्राप्तिः, तेन शब्दसन्तानः कल्प्यते । न चानवस्था, यावद्दूरं निमित्तकारणभूतः कौक्ष्य-
वायुरनुवर्त्तते, तावद्दूरं शब्दसन्तानानुवृत्तिः । अत एव प्रतिवातं शब्दानुपलम्भः, कौक्ष्य-
विभाग से उत्पन्न) शब्द के द्वारा उसके अतिसमीप के आकाश प्रदेश में दूसरे
तत्सदृश शब्द की उत्पत्ति होती है । (यह इसलिए मानना पड़ता है कि) श्रोत्र
और शब्द दोनों ही (यतः द्रव्य नहीं हैं अतः) अन्यत्र नहीं जा सकते एवं जब
तक इन्द्रिय के साथ विषय का सम्बन्ध नहीं होगा, तब तक विषय का ग्रहण
सम्भव नहीं है । अतः दूसरे शब्द से तीसरे शब्द की उत्पत्ति, तीसरे
शब्द से चौथे शब्द की उत्पत्ति, इस प्रकार शब्दसन्तान (समूह) की उत्पत्ति
होती है । इस सन्तान का अन्तिम शब्द श्रोत्र प्रदेश में जब उत्पन्न होता है, तब
उस सन्तान के उसी अन्तिम शब्द का ग्रहण होता है । इस प्रकार के शब्दसन्तान
की कल्पना क्यों आवश्यक होती है ? इसी प्रश्न का समाधान 'श्रोत्रशब्दयोः'

६१६ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे शब्द-
प्रशस्तपादभाष्यम्
ग्रहणम् । श्रोत्रशब्दयोर्गमनागमनाभावादप्राप्तस्य ग्रहणं नास्ति, परिशेषात्
सन्तानसिद्धिरिति ।
॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये गुणपदार्थः समाप्तः ॥
(उक्त समूहों के द्वारा) श्रोत्रप्रदेश में पहुँचने के बाद श्रोत्र के द्वारा उसका
प्रत्यक्ष होता है । यतः श्रोत्रेन्द्रिय और शब्द इन दोनों में से कोई भी गतिशील
नहीं है और श्रोत्र से असम्बद्ध शब्द का प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है, अतः
परिशेषानुमान से (शब्दजनित) शब्दसन्तान (समूह) की सिद्धि होती है ।
॥ प्रशस्तपादभाष्य में गुणों का निरूपण समाप्त हुआ ॥
न्यायकन्दली
वायुप्रतिघातात् । अतीवायं मार्गस्तार्किकैः क्षुण्णस्तेनास्माभिरिह भाष्यतात्पर्यमात्रं
व्याख्यातम्, नापरा युक्तिरुक्ता ।
गुणोपबद्धसिद्धान्तो युक्तिशुक्तिप्रभावितः ।
मुक्ताहार इव स्वच्छो हृदि धिन्यस्यतामयम् ॥
॥ इति भट्टश्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां गुणपदार्थः
समाप्तः ॥
इत्यादि से किया गया है । अर्थात् न शब्द ही श्रोत्र प्रदेश में जा सकता है और न
श्रोत्र ही शब्द प्रदेश में आ सकता है; क्योंकि दोनों ही क्रिया से सर्वथा रहित हैं ।
यतः इन्द्रियाँ विषय के साथ सम्बद्ध होकर ही विषय को ग्रहण करती हैं (यही
इन्द्रियों का प्राप्यकारित्व है) । अतः शब्दसन्तान की कल्पना के बिना शब्द की
उपलब्धि उपपन्न नहीं हो सकती । जल के तरङ्ग अपनी उत्पत्ति के प्रदेश में विनाश-
प्राप्त होने पर भी उससे अव्यवहित उत्तर प्रदेश में अपने सदृश ही दूसरे तरङ्ग
व्यक्ति को उत्पन्न करते हुए देखे जाते हैं । इसी दृष्टान्त के बल से शब्दसन्तान की
कल्पना करते हैं । इसमें अनवस्था दोष भी नहीं है; क्योंकि शब्द के निमित्तकारण
कोष्ठ सम्बन्धी वायु की अनुवृत्ति जितनी दूर तक रहेगी, उतनी ही दूर तक शब्दसन्तान
की अनुवृत्ति की कल्पना करेंगे । यही कारण है कि प्रतिकूल वायु के रहने पर
शब्द की उपलब्धि नहीं होती है; क्योंकि कोष्ठ सम्बन्धी वायु उससे प्रतिहत हो
जाता है । इस मार्ग को तार्किकों ने अनेक प्रकार से रौंद डाला है, अतः हम
लोगों ने भाष्य का तात्पर्य मात्र ही लिखा, कोई दूसरी युक्ति नहीं दिखलायी ।
मोती के माला की तरह (गुणनिरूपण रूप) यह स्वच्छ हार विद्वान् लोग हृदय
में धारण करें । यह हार युक्तिस्वरूप शुक्तिका में उत्पन्न मोतियों से बना है एवं
सिद्धान्त सिद्धगुण (डोरी) में गुँथा हुआ है ।
॥ भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रची गयी एवं पदार्थों को समझानेवाली न्यायकन्दली
टीका का गुणपदार्थों का विवेचन समाप्त हुआ ॥

अथ कर्मपदार्थनिरूपणम्
प्रशस्तपादभाष्यम्
उत्क्षेपणादीनां पञ्चानामपि कर्मत्वसम्बन्धः ।
एकद्रव्यवत्त्वं क्षणिकत्वं मूर्तद्रव्यवृत्तित्वमगुणवत्त्वं गुरुत्व-
द्रवत्वप्रयत्नसंयोगवत्त्वं स्वकार्यसंयोगविरोधिृत्वं संयोगविभागानिरपेक्ष-
१. कर्मत्व जाति के साथ सम्बन्ध, २. एक समय एक ही द्रव्य में रहना,
३. क्षणिकत्व, ४. मूर्त द्रव्यों में ही रहना, ५. गुणरहितत्व, ६. गुरुत्व,
द्रवत्व, प्रयत्न और संयोग इन चार गुणों से उत्पन्न होना, ७. अपने
द्वारा उत्पन्न संयोग से नष्ट होना, ८. किसी और के साहाय्य के बिना
संयोग और विभाग को उत्पन्न करना, ९. असमवायिकारणत्व,
१०. अपने आश्रयरूप द्रव्य एवं उससे भिन्न द्रव्य इन दोनों में
न्यायकन्दली
जगदङ्कुरबीजाय संसारार्णवसेतवे ।
नमो ज्ञानामृतस्यन्दिचन्द्रायार्धेन्दुमौलये ॥
उत्क्षेपणादीनां च परस्परं साधर्म्यमितरपदार्थवैधर्म्यं च प्रतिपादयन्नाह-
उत्क्षेपणादीनामिति । कर्मत्वं नाम सामान्यम्, तेन सह सम्बन्ध उत्क्षेपणा-
दीनामेव । एकद्रव्यवत्त्वम् एकदा एकस्मिन् द्रव्ये एकमेव कर्म वर्तते, एकं कर्म
एकत्रैव द्रव्ये वर्त्तत इत्येकद्रव्यवत्त्वम् । यद्येकस्मिन् द्रव्ये युगपद् विरुद्धोभयकर्म-
समवायः स्यात्, तदा तयोः परस्परप्रतिबन्धाद् दिग्विशेषसंयोगविभागानुपपत्तौ
संयोगविभागयोरनपेक्षं कारणं कर्मेति लक्षणहानिः स्यात् । अथाविरुद्धकर्मद्वयसमा-
उन अर्द्धचन्द्रशेखर शिव जी को मैं नमस्कार करता हूँ, जो जगत् रूप अङ्कुर
के बीज, संसार समुद्र से पार उतरने के सेतु एवं ऐसे चन्द्रमा के स्वरूप हैं जिनसे
ज्ञानरूप अमृत अनवरत स्रवित होता रहता है ।
उत्क्षेपणादि कर्मों के परस्पर साधर्म्य और द्रव्यादि पदार्थों के वैधर्म्य का
प्रतिपादन करते हुए 'उत्क्षेपणादीनाम्' यह वाक्य लिखा गया है । अर्थात् कर्मत्व
नाम की जो जाति है, उसके साथ उत्क्षेपणादि सभी कर्मों का सम्बन्ध है ।
'एकद्रव्यवत्त्व' शब्द से यह अभिप्रेत है कि एक समय तक द्रव्य में एक ही क्रिया
रहती है एवं एक क्रिया एक ही द्रव्य में रहती है (इसलिए एकद्रव्यवत्त्व
सभी कर्मों का साधर्म्य है) एक ही समय यदि विरुद्ध दो कर्मों की सत्ता
एक द्रव्य में मानें, तो 'संयोग और विभाग का इतर निरपेक्ष कारण ही कर्म है'
कर्म का यह लक्षण न हो सकेगा; क्योंकि (दो क्रियाओं के परस्पर
प्रतिरोध के कारण) किसी विशेष दिशा के साथ उस क्रियाश्रय द्रव्य का संयोग
नहीं हो सकता । यदि (विरुद्ध दो क्रियायें न मानकर) अविरुद्ध दो क्रियाओं
की सत्ता एक ही समय एक द्रव्य में मानें, तो उनमें से एक ही क्रिया से
अभिमत देश के साथ क्रियाश्रय द्रव्य का संयोग या विभाग उत्पन्न हो ही जाएगा,

६९८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
कारणत्वमसमवायिकारणत्वं स्वपराश्रयसमवेतकार्यारम्भकत्वं समानजातीया-
नारम्भकत्वं द्रव्यानाम्भकत्वं च प्रतिनियतजातियोगित्वम् । दिग्विशिष्ट-
कार्यारम्भकत्वं च विशेषः ।
समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले (संयोग और विभाग) वस्तुओं को उत्पन्न
करना, ११. अपने समानजातीय वस्तु को उत्पन्न न करना, १२. (प्रत्येक
क्रिया में) नियमित उत्क्षेपणत्वादि जातियों का सम्बन्ध एवं १३. दिग्विशिष्ट
कार्य का कर्तृत्व ये तेरह उत्क्षेपणादि पाँचों कर्मों के असाधारण धर्म हैं ।
न्यायकन्दली
वेशः, तदेकस्मादेव तद्देशद्रव्यसंयोगविभागयोरुपपत्तेः द्वितीयकल्पनावैयर्थ्यम् । एकमेकं कर्म
नानेकत्र वर्तते, एकस्य चलने तस्मात् कर्मणोऽन्यस्य चलनानुपलम्भात् । क्षणिकत्व-
माशुतरविनाशित्वम् । मूर्त्तद्रव्यवृत्तित्वम् अवच्छिन्नपरिमाणद्रव्यवृत्तित्वम् । अगुणवत्त्वं
गुणवत्त्वरहितत्वम् । गुरुत्वद्रवत्वप्रयत्नसंयोगजत्वम् । स्वकार्येति । स्वकार्येण संयोगेन
विनाशित्वं न विभागविनाश्यत्वम्, उत्तरसंयोगाभावप्रसङ्गात् ।
संयोगविभागेति । यथा वेगारम्भे नोदनाभिघातविशेषापेक्षत्वं नैवं
संयोगविभारम्भे नोदनाद्यपेक्षत्वमित्यर्थः । असमवायिकारणत्वम् यथा गुणानां
निमित्तकारणत्वमपि नैवं कर्मणाम्, किन्त्वसमवायिकारणत्वमेवेत्यर्थः । स्वपरा-
श्रयेति । स्वाश्रये पराश्रये च व्यासज्य समवेतं यत् कार्यं संयोगविभागलक्षणं
दूसरी क्रिया की कल्पना व्यर्थ होगी । एक ही कर्म अनेक आश्रयों में भी नहीं
रहता है; क्योंकि जिस क्रिया से आश्रयीभूत एक द्रव्य का चालन होता है, उसी
क्रिया से दूसरे द्रव्य का चालन कहीं नहीं देखा जाता । उत्पत्ति के बाद अतिशीघ्र
विनष्ट होना ही 'क्षणिकत्व' है । किसी अल्पपरिमाणवाले द्रव्य में रहना ही
'मूर्त्तद्रव्यवृत्तित्व' है । गुणवत्त्व का अभाव (फलतः गुणों का न रहना ही)
'अगुणवत्त्व' है । यह गुरुत्व, द्रवत्व, प्रयत्न और संयोग इनमें से किसी से उत्पन्न
होता है । 'स्वकार्येति' यह संयोगरूप अपने कार्य से ही विनष्ट होता है, विभाग-
रूप अपने कार्य से नहीं । यदि ऐसा मानेंगे तो क्रियाश्रय द्रव्य का उत्तरदेश
के साथ संयोग न हो सकेगा । 'संयोगविभागेति' अर्थात् क्रिया को वेग के उत्पादन
में जिस प्रकार विशेष प्रकार के नोदनसंयोग या अभिघातसंयोग की अपेक्षा
होती है, उसी प्रकार संयोग और विभाग के उत्पादन में उसे नोदनादि किसी
और वस्तु की अपेक्षा नहीं होती है । 'असमवायिकारणत्वम्' अर्थात् गुण असमवायि-
कारण होने के साथ-साथ निमित्तकारण भी हो सकता है, क्रिया में यह बात
नहीं है, वह केवल असमवायिकारण ही होती है । 'स्वपराश्रयेति' क्रिया अपने
आश्रयीभूत द्रव्य और उससे भिन्न द्रव्य में समवायसम्बन्ध से रहनेवाले एक ही