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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६४७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६४७
प्रशस्तपादभाष्यम्
कर्मणो जायते नियतदिक्क्रियाप्रबन्धहेतुः स्पर्शवद्द्रव्यसंयोगविशेषविरोधी क्वचित्
कारणगुणपूर्वक्रमेणोत्पद्यते ।
भावनासंज्ञकस्त्वात्मगुणो दृष्टश्रुतानुभूतेष्वर्थेषु स्मृतिप्रत्य-
भिज्ञानहेतुर्भवति ज्ञानमददुःखादिविरोधी । पट्वभ्यासादरप्रत्ययजः ।
नियमित देश में ही क्रियासमूह का कारण है । स्पर्श से युक्त द्रव्यों का
विशेष प्रकार का संयोग उसका विनाशक है । कहीं वह अपने आश्रय
के समवायिकारण में रहनेवाले वेग से भी उत्पन्न होता है ।
पहले देखे हुए, सुने हुए एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात अर्थों की
स्मृति और प्रत्यभिज्ञा का कारणीभूत संस्कार ही 'भावना' है । ज्ञान,
मद एवं दुःखादि से उसका नाश होता है । पटु, अभ्यास, आदर और
न्यायकन्दली
सक्त्यादीनां पिण्डीभावप्राप्तिहेतुः संयोगविशेषः । मृजा कायस्योद्वर्तनादिकृता शुद्धिः ।
आदिशब्दान्मृदुत्वं च, तेषां हेतुः । स्नेहस्यापि गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः । गुरुत्वं च
परमाणुषु नित्यम्, कार्ये च कारणगुणपूर्वकमाश्रयविनाशाद् विनाशि, तथा स्नेहोऽपीति ।
संस्कारस्त्रिविधो वेगो भावना स्थितिस्थापकश्चेति । तत्र वेगो मूर्ति-
मत्सु पञ्चद्रव्येषु निमित्तविशेषापेक्षात् कर्मणो जायते । पञ्चसु द्रव्येषु पृथिव्य-
प्तेजोवायुमनस्सु कर्म वेगं करोति नान्यत्र, स्वयमभावात् । नोदनाभिघातादि-
'मृजा' शब्द से शरीर की वह शुद्धि अभिप्रेत है, जो शरीर में (उबटन प्रभृति के)
मर्दन से प्राप्त होती है । आदि शब्द से मृदुत्वादि को समझना चाहिए । 'स्नेह' इन
सबों का कारण है । 'स्नेहस्यापि गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः' अर्थात् गुरुत्व जिस
प्रकार परमाणुओं में नित्य है, उसी प्रकार स्नेह भी परमाणुओं में नित्य है । जिस
प्रकार कार्यद्रव्य में 'गुरुत्व' कारणगुणक्रम से उत्पन्न होता है एवं आश्रय के विनाश
से विनाश को प्राप्त होता है, उसी प्रकार कार्यद्रव्य में स्नेह भी कारणगुणक्रम से
उत्पन्न होता है एवं आश्रय के विनाश से विनाश को प्राप्त होता है ।
"संस्कारस्त्रिविधो वेगो भावना स्थितिस्थापकश्चेति, तत्र वेगो मूर्त्तिमत्सु
पञ्चद्रव्येषु निमित्तविशेषापेक्षात् कर्मणो जायते" । पाँच द्रव्यों में अर्थात्
पृथिवी, जल तेज, वायु और मन इन पाँच द्रव्यों में क्रिया से वेग की
उत्पत्ति होती है, और किसी वस्तु में नहीं, क्योंकि इन पाँच द्रव्यों को छोड़-
कर क्रिया स्वयं अन्यत्र कहीं नहीं है । क्रिया को वेग के उत्पादन में नोदन
या अभिघात प्रभृति कारणों का साहाय्य आवश्यक है, वह स्वतन्त्र होकर
केवल अपन ही बल से वेग का उत्पादन नहीं कर सकती; क्योंकि मन्दगति-

६४८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कार-
प्रशस्तपादभाष्यम्
पटुप्रत्ययापेक्षादात्ममनसोः संयोगादाश्चर्येऽर्थे पटुः संस्कारातिशयो जायते ।
यथा दाक्षिणात्यस्योष्ट्रदर्शनादिति । विद्याशिल्पव्यायामादिष्वभ्यस्यमानेषु तस्मिन्ने-
वार्थे पूर्वपूर्वसंस्कारमपेक्षमाणादुत्तरोत्तरस्मात् प्रत्ययादात्ममनसोः संयोगात्
संस्कारातिशयो जायते ।
ज्ञान से इसकी उत्पत्ति होती है । पटु (अनुपेक्षात्मक) ज्ञान एवं आत्मा
और मन के संयोग से अद्भुत विषयों में 'पटु' नाम के विशेष प्रकार
के संस्कार की उत्पत्ति होती है । जैसे कि दक्षिण देश के रहनेवाले को
ऊँट के देखने से (ऊँट का पटु संस्कार होता है) । विद्या, शिल्प एवं
व्यायाम प्रभृति वस्तुओं का बार-बार अभ्यास करते रहने से उन्हीं
विषयों के पूर्व-पूर्व संस्कारों से उत्पन्न प्रतीतियों (स्मृतियों) के कारण आत्मा
और मन के संयोग से एक विशेष प्रकार के संस्कार की उत्पत्ति होती है ।
न्यायकन्दली
निमित्तविशेषापेक्षं न केवलम्, मन्दगतौ वेगाभावात् । नियतदिक्क्रियाप्रबन्धहेतुः ।
यदिगाभिमुख्येन क्रियया वेगो जन्यते तद्दिगभिमुखतयैव क्रियासन्तानस्य हेतुरित्यर्थः ।
स्पर्शवदिति । विशिष्टेन स्पर्शवद्द्रव्यसंयोगेनात्यन्तनिबिडावयववृत्तिना वेगो विनाश्यते,
यः स्वयं विशिष्टः । मन्दस्तु वेगः स्पर्शवद्द्रव्यसंयोगमात्रेण विनश्यति, यथातिदूरं
गतस्येषोस्तत्तमितवायुप्रतिबद्धस्य । क्वचिदिति । बाहुल्येन तावद्वेगः कर्मजः, क्वचिद्
वेगवदवयवारब्धे जलावयविनि कारणवेगेभ्योऽपि जायते ।
भावनेत्यादि । भावनासंज्ञकस्तु संस्कार आत्मगुणः । दृष्टश्रुतानुभूते-
रूप क्रिया के रहने पर भी वेग की उत्पत्ति नहीं होती है । 'नियतदिक्क्रिया-
प्रबन्धहेतुः' वेग नियत दिशा में ही क्रियासमूह का उत्पादक है । अर्थात् जिस दिशा
की तरफ क्रिया से वेग उत्पन्न होता है, उसी दिशा की तरफ क्रियासमूह को वेग
उत्पन्न करता है । 'स्पर्शवदिति' स्पर्श से युक्त द्रव्य के विशेष प्रकार के एवं निविड़
अवयव के द्रव्य में रहनेवाले संयोग से तीव्र वेग का विनाश होता है । मन्द वेग
का विनाश तो स्पर्श से युक्त किसी भी द्रव्य के संयोग से हो जाता है, जैसा कि
अन्यत्र दूर गये हुए बाण के वेग का विनाश मन्द गति के वायु से भी हो जाता
है । 'क्वचिदिति' अर्थात् अधिकांश वेगों की उत्पत्ति तो क्रिया से ही होती है;
किन्तु कुछ वेगों की उत्पत्ति आश्रयीभूत द्रव्य के अवयवों में रहनेवाले वेग से भी
होती है, जैसे कि जल में कारणगुणक्रम से भी वेग की उत्पत्ति होती है ।
'भावनेत्यादि' अर्थात् भावना नाम का जो संस्कार वह आत्मा का गुण है ।
'दृष्टानुभूतेषु' इस वाक्य के द्वारा इस संस्कार से उत्पन्न होनेवाले कार्यों को दिखलाया