वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २८७
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २८७
प्रशस्तपादभाष्यम्
शोभनमेतद्विधानं वध्यघातकपक्षे, सहानवस्थानलक्षणे तु विरोधे
द्रव्यज्ञानानुत्पत्तिप्रसङ्गः । कथम् ? गुणबुद्धिसमकालमपेक्षाबुद्धि-
विनाशाद् द्वित्वविनाशो तदपेक्षस्य द्वे द्रव्ये इति द्रव्यज्ञानस्यानुत्पत्तिप्रसङ्ग इति ।
लैङ्गिकवज्ज्ञानमात्रादिति चेत् ? स्यान्मतम्, यथाऽभूतं भूतस्येत्यत्र
(इस प्रक्रिया को स्वीकार करने पर 'द्वे द्रव्ये' इस आकार के)
द्रव्य ज्ञान की उत्पत्ति न हो सकेगी । (प्र.) कैसे ? (उ.) चूँकि
गुणरूप द्वित्वविषयक बुद्धि के समय ही द्वित्व का नाश हो जाएगा,
अतः द्वित्व के द्वारा उत्पन्न होनेवाले 'द्वे द्रव्ये' इस आकार के द्रव्यज्ञान
की उत्पत्ति न हो सकेगी । इस विषय में यह कह सकते थे कि (प्र.)
अनुमिति की तरह (हेतुविषयक ज्ञान से ही) उक्त 'द्वे द्रव्ये' इस
द्रव्यविषयक ज्ञान की उत्पत्ति होगी । (अभिप्राय यह है कि) जैसे
'अभूतं भूतस्य' इस सूत्र के द्वारा महर्षि ने हेतु के न रहने पर भी हेतु
न्यायकन्दली
वस्थानं चापरे । तत्राचार्यो वध्यघातकपक्षपरिग्रहं कुर्वन्नाह-शोभनमेतद्विधानमिति ।
एतद्विधानमेष द्वित्वप्रकारः । वध्यघातकपक्षे द्वितीयं ज्ञानमुत्पद्य क्षणान्तरे पूर्वं विज्ञानं
नाशयतीति पक्षे शोभनं युक्तमित्यर्थः । सहानवस्थानलक्षणे तु विरोध एकस्य ज्ञानस्यो-
त्पादोऽपरस्य विनाश इति पक्षे द्वे द्रव्ये इति ज्ञानानुत्पत्तिप्रसङ्गः, तस्मात् सहानवस्थान-
लक्षणो न युक्त इत्यभिप्रायः । एतदेवोपपादयति-कथमित्यादिना । सहानवस्थानपक्षे हि
द्वित्वकाल एवापेक्षाबुद्धेर्विनाशाद् द्वित्वस्य विनश्यता, गुणबुद्धिसमकालं च द्वित्वस्य
विनाश इति क्षणान्तरे द्वित्वापेक्षस्य द्वे द्रव्ये इति ज्ञानस्योत्पत्तिर्न भवेत् कारणाभावात् ।
आचार्य (प्रशस्तपाद) वध्यघातक पक्ष को ग्रहण करते हुए 'शोभनमेतद्विधानम्' यह
वाक्य लिखते हैं । 'एतद्विधानम्' अर्थात् द्वित्व की उत्पत्ति का यह क्रम 'वध्यघातकपक्षे'
अर्थात् 'पहला ज्ञान उत्पन्न होकर दूसरे ज्ञान को अपने उत्पत्तिक्षण के आगे
के क्षण में ही नाश कर देता है' इस पक्ष में 'शोभन' है । 'सहानवस्थानलक्षणे तु
विरोधे' अर्थात् 'एक क्षण में ज्ञान की उत्पत्ति ही उससे पूर्व के क्षण में
उत्पन्न ज्ञान का विनाश है' इस पक्ष में 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की उत्पत्ति ही नहीं
होगी । अतः 'सहानवस्थान' रूप विरोध पक्ष ठीक नहीं है । 'कथम्' इस पद से
प्रश्न कर इसका उपपादन करते हैं । (अर्थात्) सहानवस्थान पक्ष में द्वित्व के
उत्पत्तिकाल में ही अपेक्षाबुद्धि के विनाश से द्वित्वविनाश की सामग्री एकत्र हो
जाती है अतः द्वित्वविषयक (निर्विकल्पक) बुद्धि की जिस क्षण में उत्पत्ति
होती है, उस क्षण में द्वित्व का नाश हो जाता है, सुतराम् इसके अगले क्षण
में 'द्वे द्रव्ये' इस विशिष्ट बुद्धि की उत्पत्ति नहीं होगी; क्योंकि द्वित्व रूप उस
२८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
प्रशस्तपादभाष्यम्
लिङ्गाभावेऽपि ज्ञानमात्रादनुमानम्, तथा गुणविनाशेऽपि गुणबुद्धिमात्राद्
द्रव्यप्रत्ययः स्यादिति, न, विशेष्यज्ञानत्वात् । न हि विशेष्यज्ञानं सारूप्या-
के ज्ञान से अनुमिति का उपपादन किया है, वैसे ही यहाँ भी
(द्वित्व) गुण का नाश हो जाने पर भी उसके ज्ञान से ही द्रव्यविषयक
उक्त ज्ञान की उत्पत्ति होगी । (उ.) किन्तु यह कहना सम्भव
नहीं है; क्योंकि वह (द्रव्यविषयक) ज्ञान 'विशेष्यज्ञान' अर्थात्
विशिष्ट ज्ञान है। (विशिष्ट ज्ञान) विशेष्य में विशेषण के सम्बन्ध के बिना
(फलतः विशेष्य में विशेषण की सत्ता के बिना) केवल 'सारूप्य' से,
न्यायकन्दली
अत्राशङ्कते-लैङ्गिकवदिति । एतद्विस्पष्टयति-स्यान्मतमित्यादिना । एवं ते मतं
स्यादिदमभिप्रेतं भवेत् । यथा ध्वनिविशेषेण पुरुषानुमाने ज्ञातमेव ध्वनिलक्षणं
लिङ्गमभूतमविद्यमानं विनष्टमेव भूतस्य विद्यमानस्य पुरुषविशेषस्य लिङ्गं भवतीति
लिङ्गस्याभावेऽपि तज्ज्ञानमात्रादेव लैङ्गिकं ज्ञानं जायते, तथा गुणबुद्धिसमकालं द्वित्वे
विनष्टेऽपि तज्ज्ञानमात्रादेव द्वे द्रव्ये इति ज्ञानं स्यादिति । अन्यस्तु-अभूतं वर्षकर्म भूतस्य
वाय्वभ्रसंयोगस्य लिङ्गमित्यत्र वर्षकर्मणो लिङ्गस्याभावेऽपि तज्ज्ञानमात्रादेवानुमानमिति
व्याचष्टे । तदसङ्गतम्, न ह्यत्र वर्षकर्म लिङ्गम्, अपि तु तस्याभावः । स च तदानीमस्त्येव,
स्वरूपेण वस्त्वनुत्पादे प्रागभावस्याविनाशात् । तस्मादस्मदुक्तैव रीतिरनुसरणीया ।
बुद्धि का कारण उस समय नहीं है। 'लैङ्गिकवत्' इस वाक्य के द्वारा सहानवस्थान
रूप विरोधपक्ष के समर्थन का उपक्रम करते हैं एवं 'स्यान्मतम्' इत्यादि से इसी
पक्ष को स्पष्ट करते हैं । अर्थात् सहानवस्थान रूप विरोध मानने वालों का यह
अभिप्राय हो सकता है कि जैसे विशेष प्रकार की ध्वनि से पुरुष का अनुमान होने
में ध्वनिरूप हेतु केवल ज्ञात ही रहता है (पुरुष की अनुमिति के अव्यवहित
पूर्वक्षण में उसकी सत्ता नहीं रहती है), अतः 'अभूत' अविद्यमान फलतः विनष्ट
(ध्वनिरूप हेतु) ही 'भूत' अर्थात् विद्यमान उस पुरुषविशेष का (ज्ञापक) हेतु होता
है । जिस प्रकार हेतु के न रहने पर भी हेतु के केवल ज्ञान से ही पुरुष की उक्त
अनुमिति होती है, उसी प्रकार गुणरूप द्वित्वविषयक ज्ञान के समय ही द्वित्व के
नष्ट हो जाने पर भी (विनष्ट) द्वित्व के ज्ञान से 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान भी होगा ।
'अभूतं भूतस्य' इस (वैशेषिक) सूत्र की व्याख्या कोई इस प्रकार करते हैं कि
'अभूतम्' अर्थात् अविद्यमान वर्षारूप क्रिया 'भूतस्य' अर्थात् वायु एवं मेघ के
विद्यमान संयोग का (ज्ञापक) लिङ्ग है; किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है;
क्योंकि प्रकृत में वर्षारूप क्रिया (वायु और मेघ के संयोग का ज्ञापक) हेतु
नहीं है; किन्तु वर्षारूप क्रिया का (प्राक्) अभाव ही (उक्त संयोग का) हेतु है । वह